headlines live newss

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चलती कार में गैंगरेप और हत्या के मामले में 3 दोषियों की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदला

हाई कोर्ट ने सुनाया बड़ा फेसला 2024 09 14T131109.530

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2018 में चलती कार में गैंगरेप और हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए तीन आरोपियों की फांसी की सजा को 25

Table of Contents

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2018 में चलती कार में गैंगरेप और हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए तीन आरोपियों की फांसी की सजा को 25 साल की उम्रकैद में बदल दिया है। इस मामले में बुलंदशहर के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश द्वारा दी गई फांसी की सजा की पुष्टि के लिए हाईकोर्ट में मामला रेफर किया गया था। हाईकोर्ट ने यह कहते हुए कि यह दुर्लभतम मामलों में से एक नहीं है, फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया।

इलाहाबाद हाईकोर्ट

इस फैसले में न्यायमूर्ति अरविंद सिंह सांगवान की एकल पीठ ने सजा को संशोधित करने के लिए कई तर्क दिए। उन्होंने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने फांसी की सजा देते समय कोई भी न्यूनतम परिस्थिति दर्ज नहीं की थी जो यह दिखा सके कि केवल फांसी की सजा ही इस मामले में उचित है। इसके अतिरिक्त, कोर्ट ने इस बात का भी उल्लेख किया कि आरोपी की उम्र और उनके सामाजिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए उनके सुधार की संभावना को पूरी तरह से नकारा नहीं जा सकता।

इलाहाबाद हाईकोर्ट: मामले के संक्षिप्त तथ्य

यह घटना 2018 की है जब एक छोटी नहर या नाले के पास एक अज्ञात लड़की का शव बरामद किया गया था। शव पर कोई बाहरी चोट के निशान नहीं थे और इसे पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया था। बाद में, पीड़िता के पिता ने अस्पताल में उस शव की पहचान अपनी बेटी के रूप में की। इस घटना ने स्थानीय समुदाय में भय और चिंता फैलाई थी।

वैवाहिक बलात्कार: विवाह संस्था को नष्ट कर देगा और पूरे पारिवारिक तंत्र को भारी तनाव में डाल देगा: केंद्र ने सर्वोच्च न्यायालय में अपने जवाबी हलफनामे के माध्यम से वैवाहिक बलात्कार अपवाद का बचाव किया

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट: यदि मुकदमे या अपील के लंबित रहने के दौरान किशोर आरोपी वयस्क हो जाता है, तो जमानत या सजा निलंबन के लिए क्या होना चाहिए विचार?

कुछ दिन बाद, पुलिस को सूचना मिली कि सफेद रंग की ऑल्टो कार में दो आरोपी घूम रहे हैं, जिस पर ‘अब्बासी बॉयज’ का स्टीकर चिपका हुआ था। पुलिस ने उन्हें घेरकर गिरफ्तार किया और कार की तलाशी ली। इस तलाशी में एक दाहिने पैर की महिला चप्पल बरामद हुई थी, जिसे पीड़िता के पिता ने पहचान लिया।

पुलिस ने आरोपियों का कबूलनामा भी दर्ज किया, जिसमें उन्होंने घटना के बारे में बताया। आरोपियों ने बताया कि उन्होंने एक अन्य व्यक्ति के साथ मिलकर एक लड़की को उठाने की योजना बनाई थी। उन्होंने लड़की को अकेले चलते हुए देखा और जबरदस्ती उसे कार में बैठा लिया। चलती कार में उन्होंने बारी-बारी से उसके साथ बलात्कार किया और जब वह रोने लगी, तो उसके दुपट्टे से उसका गला घोंटकर हत्या कर दी और उसका शव एक नाले में फेंक दिया। इस बयान के बाद पुलिस ने तीसरे आरोपी को भी गिरफ्तार किया।

इलाहाबाद हाईकोर्ट: ट्रायल कोर्ट का फैसला

ट्रायल कोर्ट ने इन तीनों आरोपियों को दोषी ठहराते हुए उन्हें मौत की सजा सुनाई थी। ट्रायल कोर्ट का कहना था कि इस मामले की गंभीरता और अपराध की बर्बरता को देखते हुए फांसी की सजा उचित है। अभियोजन पक्ष ने इस मामले को ‘दुर्लभतम मामलों में से एक’ बताते हुए मौत की सजा की मांग की थी।

हालांकि, आरोपियों के वकीलों ने इस सजा को चुनौती दी और हाईकोर्ट में अपील की। उनका तर्क था कि यह मामला दुर्लभतम मामलों में से एक नहीं है और इसमें सुधार की संभावना को नकारा नहीं जा सकता।

इलाहाबाद हाईकोर्ट: हाईकोर्ट का फैसला

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले की समीक्षा की और पाया कि इसमें कई न्यूनतम परिस्थितियों का उचित मूल्यांकन नहीं किया गया था। अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने यह निष्कर्ष नहीं निकाला था कि यह मामला ऐसा असाधारण है जिसमें मौत की सजा ही एकमात्र विकल्प है। इसके अलावा, ट्रायल कोर्ट ने यह भी कोई निष्कर्ष नहीं निकाला कि आरोपी समाज के लिए खतरा हैं या नहीं।

अदालत ने निम्नलिखित न्यूनतम परिस्थितियों का उल्लेख किया:

  1. आपराधिक इतिहास का अभाव: आरोपियों का कोई आपराधिक इतिहास नहीं था और उनके परिवार उनके समर्थन में थे। यह दर्शाता है कि वे पहली बार इस तरह के अपराध में लिप्त हुए हैं, जिससे उनके सुधार की संभावना बनी रहती है।
  2. आरोपियों की उम्र: आरोपियों की उम्र लगभग 24 वर्ष है और उनमें से एक को स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी हैं। ऐसे में, अदालत ने यह निष्कर्ष निकाला कि सुधार और पुनर्वास की संभावना को नकारा नहीं जा सकता। ट्रायल कोर्ट ने यह निष्कर्ष नहीं निकाला था कि सबसे कठोर सजा ही एकमात्र विकल्प है।
  3. समाज के लिए खतरे का अभाव: ट्रायल कोर्ट ने यह भी नहीं पाया था कि आरोपी समाज के लिए किसी भी प्रकार का खतरा हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि वे समाज में सुधार की संभावना रखते हैं।
  4. गंभीर परिस्थिति का अभाव: ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों के खिलाफ कोई गंभीर परिस्थिति दर्ज नहीं की थी जो यह दिखा सके कि केवल फांसी की सजा ही दी जानी चाहिए, खासकर जब आरोपियों का कोई आपराधिक इतिहास नहीं था।
  5. असाधारण परिस्थिति का अभाव: मौत की सजा को लागू करने के लिए असाधारण परिस्थितियां होनी चाहिए, जो उलटी नहीं की जा सकतीं। ट्रायल कोर्ट ने ऐसी कोई परिस्थिति दर्ज नहीं की थी।
  6. ‘दुर्लभतम मामलों में से एक’ का अभाव: अंत में, ट्रायल कोर्ट ने यह भी कोई निष्कर्ष नहीं निकाला था कि यह मामला ‘दुर्लभतम में से दुर्लभ’ है, हालांकि आरोपियों ने सबसे गंभीर अपराध किया है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट: सुप्रीम कोर्ट के फैसले का संदर्भ

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्ववर्ती फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि मौत की सजा केवल तभी दी जानी चाहिए जब अन्य सभी सजा के विकल्प अनुपयुक्त हों। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि ऐसे मामलों में जहां सुधार की संभावना हो, वहां मौत की सजा न देकर उम्रकैद दी जानी चाहिए।

Headlines Live News

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि आरोपियों के सुधार और पुनर्वास की संभावना को ध्यान में रखते हुए उन्हें मौत की सजा न देकर उम्रकैद की सजा दी जानी चाहिए। समाज में पुनर्वास और सुधार की संभावना को न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण पहलू माना है और इसे न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा बनाना आवश्यक समझा है।

इस संदर्भ में, अदालत ने कहा कि आरोपियों की उम्र और उनकी सामाजिक स्थिति को देखते हुए यह मानना अनुचित होगा कि उनके सुधार की कोई संभावना नहीं है। इसके अलावा, अदालत ने यह भी माना कि उनके परिवार के समर्थन में होने से यह संभावना और भी बढ़ जाती है कि वे समाज में फिर से स्थापित हो सकते हैं।

इलाहाबाद हाईकोर्ट: सजा में संशोधन

इन सभी तर्कों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तीनों आरोपियों की सजा को संशोधित किया और उन्हें 25 साल की उम्रकैद की सजा सुनाई, जिसमें किसी भी प्रकार की रियायत नहीं दी जाएगी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस सजा के दौरान किसी भी प्रकार की माफी या रियायत नहीं दी जाएगी, ताकि न्याय सुनिश्चित हो सके और पीड़िता के परिवार को न्याय मिल सके।

Headlines Live News

यह फैसला यह दर्शाता है कि न्यायपालिका का उद्देश्य केवल सजा देना नहीं है, बल्कि सुधार और पुनर्वास की संभावना को भी ध्यान में रखना है। अदालत ने कहा कि मौत की सजा केवल उन्हीं मामलों में दी जानी चाहिए, जो दुर्लभतम में से दुर्लभ हों और जहां किसी भी प्रकार की सुधार की संभावना न हो। इस मामले में, आरोपियों की उम्र, उनके आपराधिक इतिहास का अभाव और समाज में सुधार की संभावना को देखते हुए हाईकोर्ट ने फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया।

यह निर्णय न्यायिक प्रक्रिया के संतुलन और न्याय की अवधारणा को स्पष्ट रूप से परिलक्षित करता है, जहां कानून का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि समाज में पुनर्वास और सुधार की संभावना को भी बढ़ावा देना है।

News Letter Free Subscription

Facebook
WhatsApp
Twitter
Threads
Telegram
Picture of Headlines Live News Desk

Headlines Live News Desk

Headlines Live News Desk हमारी आधिकारिक संपादकीय टीम है, जो राजनीति, क्राइम और राष्ट्रीय मुद्दों पर तथ्यात्मक और विश्वसनीय रिपोर्टिंग करती है।

All Posts

संबंधित खबरें

Leave a comment