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गोविंद पानसरे हत्याकांड: बॉम्बे हाईकोर्ट ने जांच की निगरानी समाप्त की, त्वरित कार्यवाही का निर्देश

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गोविंद पानसरे हत्याकांड: बॉम्बे हाईकोर्ट ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के नेता गोविंद पानसरे की 2015 में हुई हत्या के मामले में जांच की निगरानी

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गोविंद पानसरे हत्याकांड: बॉम्बे हाईकोर्ट ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के नेता गोविंद पानसरे की 2015 में हुई हत्या के मामले में जांच की निगरानी समाप्त करने का निर्णय लिया है। न्यायमूर्ति ए.एस. गडकरी और न्यायमूर्ति कमल खता की खंडपीठ ने गुरुवार को कहा कि अब जांच का मुख्य उद्देश्य दो फरार आरोपियों का पता लगाना है। अदालत ने इसे ऐसा पहलू माना जिसे अब उसकी निगरानी की आवश्यकता नहीं है।

गोविंद पानसरे हत्याकांड

गोविंद पानसरे हत्याकांड: निगरानी समाप्त करने के पीछे का कारण

पीठ ने अपने आदेश में कहा,
“हमारे लिए यह स्पष्ट है कि जांच के लिए केवल एक ही पहलू बचा है, वह है फरार दो आरोपियों का पता लगाना। केवल इस कार्य के लिए उच्च न्यायालय द्वारा जांच की निगरानी आवश्यक नहीं है।”
इस आदेश के साथ ही अदालत ने मामले में जारी निगरानी को समाप्त कर दिया। यह निर्णय उस याचिका के निपटारे के बाद आया जिसमें कुछ आरोपियों ने अदालत की निरंतर निगरानी को चुनौती दी थी।

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हालांकि, उच्च न्यायालय ने ट्रायल कोर्ट को आदेश दिया कि वह इस मामले में तेजी से कार्रवाई करे। अदालत ने कहा कि मुकदमे की सुनवाई दैनिक आधार पर की जानी चाहिए ताकि लंबे समय से लंबित इस मामले में न्याय हो सके।

गोविंद पानसरे हत्याकांड: हत्या का मामला और घटनाक्रम

गोविंद पानसरे की हत्या फरवरी 2015 में उनके कोल्हापुर स्थित घर के पास की गई थी। चरमपंथियों ने उन्हें गोली मार दी थी, जिसके पांच दिन बाद उनकी मौत हो गई। पानसरे वामपंथी विचारधारा के नेता और प्रगतिशील विचारों के समर्थक थे। उनकी हत्या ने राज्य और देशभर में आक्रोश पैदा कर दिया था।

हत्या के मामले में जांच पहले राज्य पुलिस की अपराध जांच विभाग (सीआईडी) की विशेष जांच टीम (एसआईटी) द्वारा की जा रही थी। हालांकि, अगस्त 2022 में उच्च न्यायालय के निर्देश पर यह मामला महाराष्ट्र आतंकवाद निरोधी दस्ते (एटीएस) को सौंप दिया गया।

गोविंद पानसरे की बेटी स्मिता पानसरे ने इस मामले में जांच की धीमी प्रगति पर सवाल उठाते हुए उच्च न्यायालय का रुख किया था। उन्होंने अदालत को यह भी बताया कि उनके पिता के साथ-साथ अन्य प्रगतिशील विचारकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं जैसे नरेंद्र दाभोलकर, एमएम कलबुर्गी और गौरी लंकेश की हत्याएं भी एक ही साजिश का हिस्सा हैं। स्मिता ने यह तर्क दिया कि इन चारों हत्याओं के पीछे की साजिश और अपराधियों के नेटवर्क एक जैसे हैं।

गोविंद पानसरे हत्याकांड: साजिश की धारणा और न्यायालय की टिप्पणी

स्मिता पानसरे और अन्य याचिकाकर्ताओं ने अदालत में यह भी कहा कि इन हत्याओं के पीछे एक ही मास्टरमाइंड है, जिसने इन सभी प्रगतिशील विचारकों को निशाना बनाया। अदालत ने हालांकि, इस पहलू पर कोई विस्तृत टिप्पणी नहीं की, लेकिन जांच एजेंसियों को निष्पक्ष और तेज़ कार्रवाई करने का निर्देश दिया।

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अब जांच एजेंसी का मुख्य कार्य फरार दो आरोपियों का पता लगाना है। अदालत के आदेश के अनुसार, एजेंसी को यह सुनिश्चित करना होगा कि इन आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद मामले की सुनवाई को त्वरित रूप से निपटाया जाए।

गोविंद पानसरे की हत्या का मामला भारतीय न्याय प्रणाली में लंबित जटिल मामलों में से एक है। उच्च न्यायालय का यह फैसला पीड़ित परिवार और न्याय की प्रतीक्षा कर रहे लोगों के लिए उम्मीद की किरण है। त्वरित सुनवाई के निर्देश से उम्मीद की जा रही है कि इस मामले में जल्द ही न्याय मिलेगा और दोषियों को सजा दी जाएगी।

इस मामले में अदालत ने जांच की निगरानी भले ही समाप्त कर दी हो, लेकिन ट्रायल कोर्ट को दी गई जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करती है कि अब इस मामले में और देरी न हो। यह फैसला न केवल गोविंद पानसरे के परिवार के लिए बल्कि भारतीय न्याय प्रणाली के लिए भी एक महत्वपूर्ण कदम है।

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