SENIOR ADVOCATE इंदिरा जयसिंह: सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने हाल ही में अपने एक व्याख्यान में भारत के धर्मनिरपेक्ष संविधान और उसमें निहित मूल्यों की रक्षा के महत्व पर जोर दिया।
उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में संविधान और इसके बुनियादी सिद्धांतों को गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
SENIOR ADVOCATE इंदिरा जयसिंह: संविधान और न्यायपालिका की भूमिका
इंदिरा जयसिंह “भारत का आधुनिक संविधानवाद” विषय पर “29वें जस्टिस सुनंदा भंडारे स्मारक व्याख्यान” में बोल रही थीं। इस कार्यक्रम में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस मदन बी लोकुर, दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीके उपाध्याय (मुख्य अतिथि) और जस्टिस विभु बाखरू भी उपस्थित थे। अपने संबोधन में, जयसिंह ने संविधानवाद और उसमें न्यायपालिका की भूमिका को लेकर गहन विचार व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि संविधानवाद नागरिकों को मौलिक अधिकार प्रदान करता है, जिनका उल्लंघन राज्य नहीं कर सकता। हालांकि, हाल के वर्षों में संविधान को खारिज करने की प्रवृत्ति बढ़ी है, जिससे संहिताबद्ध मानदंडों की आवश्यकता पर ही सवाल उठने लगे हैं। जयसिंह ने कहा,
“संविधान एक बाध्यकारी मानदंड है। आज हमें यह बताया जाता है कि संविधान को केवल दिशा-निर्देश के रूप में लिया जाए। हमें यह याद रखने की जरूरत है कि संविधान उन सभी के लिए बाध्यकारी है जो संवैधानिक शक्ति के पदों पर हैं।”
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि न्यायपालिका नागरिकों के अधिकारों की संरक्षक है, लेकिन यह विचार करने का समय है कि क्या न्यायपालिका ने वास्तव में अपनी भूमिका को सफलतापूर्वक निभाया है।
“आधुनिक संविधान को सीमित करने के प्रयास किए जा रहे हैं। हम देख रहे हैं कि संविधान की रक्षा करने के लिए जिन लोगों को जिम्मेदारी सौंपी गई थी, वही अब इसके उल्लंघन की स्थिति उत्पन्न कर रहे हैं।”
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संविधान और धर्मनिरपेक्षता पर जोर
जयसिंह ने अपने व्याख्यान में भारत के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के एक बयान का भी उल्लेख किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि बच्चों को “मूल संविधान” वितरित किया जाना चाहिए, जिसमें हिंदू भगवान राम के चित्र थे। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए जयसिंह ने इसे गलत सूचना करार दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि “मूल संविधान” की तीन प्रतियां हैं, जो संसद और सुप्रीम कोर्ट में रखी गई हैं। उन्होंने कहा कि राम के चित्र 1954 में बनाए गए थे और वे संविधान के मूल दस्तावेज का हिस्सा नहीं थे।
उन्होंने यह सवाल उठाया कि “मूल संविधान” का वास्तव में क्या अर्थ है और उपराष्ट्रपति की टिप्पणी को ऐतिहासिक तथ्यों के विपरीत बताया। जयसिंह ने स्पष्ट किया कि संविधान को धर्मनिरपेक्ष बनाए रखने के लिए इसे किसी विशेष धर्म से जोड़ना गलत है। उन्होंने कहा कि संविधान में सभी धर्मों को समान रूप से सम्मान दिया गया है और इसे हिंदू राष्ट्र में बदलने की कोई संभावना नहीं है।
“भारत का संविधान धर्मनिरपेक्षता की नींव पर टिका है। इस राष्ट्र को हिंदू राष्ट्र में बदलने का कोई संवैधानिक आधार नहीं है।”
संविधान और महिलाओं की भूमिका
जयसिंह ने संविधानवाद और नारीवाद के आपसी संबंधों को भी स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि संविधान और नारीवाद एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और दोनों को समानता और स्वतंत्रता के सिद्धांतों द्वारा परिभाषित किया गया है। उन्होंने कहा कि महिलाओं की भूमिका भारतीय संविधान के निर्माण और उसके कार्यान्वयन में महत्वपूर्ण रही है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के कई ऐतिहासिक निर्णयों का हवाला दिया, जिनमें महिलाओं और ट्रांसजेंडरों के अधिकारों को मान्यता दी गई।
उन्होंने विशेष रूप से शायरा बानो मामले का उल्लेख किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया था। यह फैसला महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण कदम था। जयसिंह ने इस फैसले को संविधान द्वारा समर्थित महिलाओं के अधिकारों की पुष्टि के रूप में देखा।
“संविधान महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा करता है और न्यायपालिका ने इसे सुनिश्चित करने के लिए कई महत्वपूर्ण फैसले दिए हैं।”
संविधान के प्रति बढ़ती चुनौतियां
जयसिंह ने कहा कि हाल के वर्षों में संविधान को कमजोर करने की प्रवृत्ति बढ़ी है। उन्होंने कहा कि कई शक्तिशाली संस्थाएं संविधान को महज एक दस्तावेज मानने लगी हैं और इसकी बाध्यकारी शक्ति को नजरअंदाज कर रही हैं। उन्होंने कहा कि इस प्रवृत्ति से संविधान की स्थिरता पर खतरा मंडरा सकता है।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि नागरिकों को संविधान की रक्षा के लिए आगे आना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इसकी मूल भावना सुरक्षित रहे। उन्होंने कहा,
“संविधान केवल एक दस्तावेज नहीं है, यह एक सामाजिक समझौता है जो हमें समानता और न्याय की गारंटी देता है। हमें इसे बचाने के लिए सतर्क रहना होगा।”
संविधान का मूल ढांचा और उसकी स्थिरता
जयसिंह ने संविधान के भविष्य को लेकर भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि संविधान का मूल ढांचा अडिग है, लेकिन इसे बचाने के लिए निरंतर प्रयास करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि यदि संविधान को कमजोर करने की प्रवृत्ति को रोका नहीं गया, तो यह लोकतंत्र के लिए गंभीर संकट पैदा कर सकता है।
उन्होंने न्यायपालिका से अपेक्षा की कि वह संविधान की रक्षा के लिए अपने कर्तव्यों का पालन करे। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका को नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए सतर्क रहना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि संविधान के मूल सिद्धांतों से कोई समझौता न किया जाए।
संविधान की सुरक्षा और न्यायपालिका की भूमिका
अपने व्याख्यान के अंत में, इंदिरा जयसिंह ने संविधान की सुरक्षा और न्यायपालिका की भूमिका पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि भारत का संविधान धर्मनिरपेक्षता और समानता के सिद्धांतों पर आधारित है और इसे किसी भी विशेष धर्म के प्रभाव में लाना संविधान के मूल विचारों के खिलाफ होगा।
उन्होंने कहा कि नागरिकों को संविधान की रक्षा के लिए सतर्क रहना चाहिए और न्यायपालिका को अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए। उन्होंने संविधान के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हुए कहा,
“संविधान हमें समानता, स्वतंत्रता और न्याय की गारंटी देता है। हमें इसे बचाने और इसे मजबूत करने के लिए निरंतर प्रयास करना होगा।”
जयसिंह के इस व्याख्यान ने संविधान की रक्षा और धर्मनिरपेक्षता के महत्व को रेखांकित किया और इस बात पर जोर दिया कि भारतीय लोकतंत्र को मजबूत बनाए रखने के लिए संविधान के मूल सिद्धांतों की रक्षा आवश्यक है।
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