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DELHI HC: बिना जांच बर्खास्त कांस्टेबल को बहाल किया 2024!

हाई कोर्ट ने सुनाया बड़ा फेसला 2024 09 18T142236.788

DELHI HC: दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में उस प्रशासनिक ट्रिब्यूनल के आदेश को बरकरार रखा, जिसमें एक पुलिस कांस्टेबल की सेवा को उसकी

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DELHI HC: दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में उस प्रशासनिक ट्रिब्यूनल के आदेश को बरकरार रखा, जिसमें एक पुलिस कांस्टेबल की सेवा को उसकी बर्खास्तगी के बाद बहाल किया गया। कांस्टेबल पर हत्या और साक्ष्य छिपाने का आरोप था, लेकिन उसे बिना किसी औपचारिक जांच के बर्खास्त कर दिया गया था, जो संविधान के अनुच्छेद 311(2)(b) के तहत संभव था।

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यह मामला संविधान की व्याख्या और कर्मचारियों की बर्खास्तगी से जुड़ी कानूनी प्रक्रियाओं पर महत्वपूर्ण सवाल उठाता है।

DELHI HC: मामला और घटनाक्रम

यह मामला एक पुलिस कांस्टेबल की सेवा से बर्खास्तगी से जुड़ा था, जिसे अनुच्छेद 311(2)(b) के तहत बिना किसी जांच के बर्खास्त कर दिया गया था। अनुच्छेद 311(2)(b) विशेष परिस्थितियों में यह प्रावधान करता है कि अगर यह मान लिया जाए कि किसी कारणवश जांच करना संभव नहीं है, तो बिना जांच किए बर्खास्तगी की जा सकती है।

कांस्टेबल के खिलाफ आरोप था कि उसने अपने माता-पिता की हत्या की और इस अपराध से जुड़े साक्ष्यों को छिपाया। इस आरोप के बाद कांस्टेबल को दिल्ली पुलिस ने सेवा से बर्खास्त कर दिया था। हालांकि, बाद में उसे इस आपराधिक मामले में बरी कर दिया गया था। इसके बाद, कांस्टेबल ने प्रशासनिक ट्रिब्यूनल में अपनी बर्खास्तगी के खिलाफ अपील की, और ट्रिब्यूनल ने यह निर्णय लिया कि उसकी बर्खास्तगी बिना किसी उचित जांच के की गई थी, और उसे बहाल किया।

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DELHI HC: कोर्ट की टिप्पणियाँ

दिल्ली हाईकोर्ट ने प्रशासनिक ट्रिब्यूनल के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा कि बर्खास्तगी का आदेश जारी करते समय इस बात का कोई ठोस आधार नहीं दिया गया कि जांच करना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं था। कोर्ट ने यह भी कहा कि कांस्टेबल के खिलाफ आरोप की गंभीरता से यह साबित नहीं किया जा सकता कि अनुच्छेद 311(2)(b) का उपयोग उचित था। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि आरोप की गंभीरता या अपराध का स्तर यह निर्धारित करने में कोई भूमिका नहीं निभाता कि क्या जांच करना संभव था या नहीं।

कोर्ट ने इस बात को भी रेखांकित किया कि यदि इस प्रकार के तर्क को स्वीकार किया जाता है, तो यह पुलिस अधिकारियों के खिलाफ हर गंभीर अपराध में बिना जांच के बर्खास्तगी की राह खोल देगा, जो एक अस्वीकृत तरीका होगा। सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही यूनियन ऑफ इंडिया बनाम तुलसीराम पटेल (1985) के अपने फैसले में यह स्पष्ट किया था कि अनुच्छेद 311(2)(b) का गलत इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए और इसकी उपयोगिता केवल विशिष्ट परिस्थितियों में ही हो सकती है।

DELHI HC: अनुच्छेद 311(2)(b) का संदर्भ

अनुच्छेद 311(2)(b) भारतीय संविधान में कर्मचारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए एक प्रावधान है, जो यह कहता है कि किसी सरकारी कर्मचारी को बर्खास्त या सेवा से हटाए बिना उसे आरोपों से अवगत कराना और अपनी बात रखने का अवसर देना आवश्यक है। हालांकि, यदि यह माना जाता है कि किसी कारणवश यह संभव नहीं है, तो इस अनुच्छेद के तहत कर्मचारी की बर्खास्तगी की जा सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने पहले यह कहा था कि अनुच्छेद 311(2)(b) का उपयोग सिर्फ ऐसे मामलों में किया जा सकता है, जब यह साबित हो कि किसी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ कोई साक्ष्य इकट्ठा करना या गवाहों से जानकारी प्राप्त करना संभव नहीं है। उदाहरण के लिए, यदि कोई कर्मचारी गवाहों को डराता या धमकाता है, तो इस स्थिति में जांच नहीं हो सकती। लेकिन यह खतरनाक होगा यदि इसका इस्तेमाल केवल आरोपों की गंभीरता को देखते हुए बिना उचित जांच के किया जाए।

DELHI HC: प्रशासनिक ट्रिब्यूनल का फैसला

प्रशासनिक ट्रिब्यूनल ने यह पाया कि कांस्टेबल के खिलाफ लगाए गए आरोपों के आधार पर बर्खास्तगी का आदेश देना अनुचित था, क्योंकि किसी औपचारिक जांच के बिना उसे दोषी ठहराना गलत था। कोर्ट ने यह कहा कि, “बर्खास्तगी का आदेश केवल इस आधार पर नहीं हो सकता कि आरोप गंभीर हैं और आरोपों से संबंधित कोई गवाह सामने नहीं आ सकता।”

इसका मतलब यह था कि बर्खास्तगी का आदेश केवल आरोपों की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए नहीं दिया जा सकता, बल्कि यह निर्धारित करना आवश्यक है कि क्या जांच करना सचमुच संभव था या नहीं।

सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही यूनियन ऑफ इंडिया बनाम तुलसीराम पटेल (1985) के मामले में यह स्पष्ट किया था कि अनुच्छेद 311(2)(b) का उपयोग गंभीर परिस्थितियों में ही किया जा सकता है। यह मामला प्रशासनिक न्यायपालिका को यह बताने के लिए महत्वपूर्ण था कि अनुच्छेद का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा था कि एक सरकारी कर्मचारी को बर्खास्त या हटाए जाने से पहले उसे पूरी तरह से आरोपों से अवगत कराना और उसे अपनी सफाई देने का अवसर देना आवश्यक है, जब तक कि यह साबित न हो कि कोई गवाह सामने नहीं आ सकता है या कोई अन्य कारण है जिससे जांच संभव नहीं हो।

DELHI HC: कानूनी और प्रशासनिक निष्कर्ष

दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मामले में प्रशासनिक ट्रिब्यूनल के फैसले को बरकरार रखते हुए यह स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 311(2)(b) का उपयोग केवल तब किया जा सकता है, जब यह सिद्ध हो कि जांच करना सचमुच संभव नहीं है। यह सुनिश्चित करने के लिए कि किसी कर्मचारी को अनुचित तरीके से बर्खास्त न किया जाए, कोर्ट ने यह भी कहा कि सरकार को अपने खुद के जारी किए गए सर्कुलरों का पालन करना होगा।

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दिल्ली पुलिस द्वारा जारी सर्कुलरों में यह स्पष्ट किया गया था कि अनुच्छेद 311(2)(b) का उपयोग किस स्थिति में किया जा सकता है, और अदालत ने इसे मान्यता दी कि सरकार अपने सर्कुलरों का पालन करने के लिए बाध्य है। कोर्ट ने यह भी कहा कि राज्य केवल इस आधार पर एक कर्मचारी को बर्खास्त नहीं कर सकता कि आरोप गंभीर हैं, बल्कि इसे पूरी जांच प्रक्रिया के तहत देखा जाना चाहिए।

अंततः दिल्ली हाईकोर्ट ने प्रशासनिक ट्रिब्यूनल के आदेश को बरकरार रखा और राज्य को कांस्टेबल के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करने की स्वतंत्रता दी। हालांकि, राज्य की याचिका को खारिज करते हुए कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 311(2)(b) के तहत बर्खास्तगी के आदेश को उचित आधार के बिना नहीं माना जा सकता।

मामला: सरकार, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली व अन्य बनाम नीरज कुमार [2024: DHC: 8336-DB]

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