CULCUTTA HC: कलकत्ता हाईकोर्ट ने प्राथमिक शिक्षकों की भर्ती घोटाले में भ्रष्टाचार के आरोपी और टीएमसी (युवा विंग) के निलंबित सदस्य कुंतल घोष को जमानत दे दी है। न्यायमूर्ति सुव्र घोष की एकल पीठ ने इस निर्णय में बताया कि याचिकाकर्ता पहली बार अपराध के आरोपी हैं और उनके खिलाफ कोई पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है।
CULCUTTA HC: मामले का संक्षिप्त विवरण
कुंतल घोष को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने 2023 में गिरफ्तार किया था। उनकी गिरफ्तारी केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) की एक प्राथमिकी के आधार पर हुई थी। इस प्राथमिकी में आरोप था कि घोष ने प्राथमिक शिक्षकों और अन्य कर्मचारियों की अवैध नियुक्तियों के लिए वित्तीय लाभ लिया।
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ईडी ने अपनी जांच में यह दावा किया कि घोष ने 325 उम्मीदवारों से ₹3.25 करोड़ की वसूली की और अवैध नियुक्तियों के लिए ₹16 करोड़ की राशि एकत्र की। घोष के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 7, 7ए और 8 के साथ-साथ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 120बी, 420, 467, 468, 471 और 34 के तहत मामले दर्ज किए गए थे।
CULCUTTA HC: अदालत की टिप्पणी
अदालत ने इस मामले में संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला देते हुए कहा कि यह जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार संरक्षित करता है। न्यायमूर्ति सुव्र घोष ने कहा,
“याचिकाकर्ता अपनी अधिकतम सजा की अवधि का एक-तिहाई हिस्सा पूरा कर चुका है। यह तथ्य विवादित नहीं है कि वह पहली बार अपराध के आरोपी हैं और उनके खिलाफ इससे पहले कोई दोष सिद्ध नहीं हुआ है।”
अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता को लंबे समय तक हिरासत में रखना अनुचित होगा, खासकर जब जांच पूरी हो चुकी है और ट्रायल जल्दी पूरा होने की संभावना नहीं है।
प्रवर्तन निदेशालय ने इस जमानत याचिका का विरोध किया। उन्होंने कहा कि घोष ने अवैध भर्ती प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाई और आर्थिक अपराधों में उनकी संलिप्तता सार्वजनिक प्रशासन और जनता के विश्वास को गंभीर रूप से प्रभावित करती है। ईडी के अनुसार, आर्थिक अपराधों के मामले में जमानत देने का दृष्टिकोण अलग होना चाहिए क्योंकि यह समाज के लिए गंभीर खतरा है।
ईडी ने तर्क दिया कि घोष को हिरासत में रखना जरूरी है ताकि अवैध भर्ती प्रक्रिया में शामिल अन्य लोगों और भ्रष्टाचार से जुड़े धन के प्रवाह का पता लगाया जा सके।
CULCUTTA HC: अदालत का फैसला
हाईकोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 21 और 2023 अधिनियम की धारा 479 के प्रावधानों के बीच सामंजस्य पर जोर देते हुए कहा,
“कठोर दंडात्मक प्रावधानों के बावजूद, एक संवैधानिक अदालत को आरोपी के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा करनी चाहिए। भले ही अपराध गंभीर हो, अदालत को संविधानवाद और कानून के शासन के पक्ष में झुकना चाहिए।”
घोष के वकील ने तर्क दिया कि वह 22 महीने से अधिक समय से हिरासत में हैं और जांच पूरी हो चुकी है। उन्होंने अदालत से अपील की कि ट्रायल जल्दी पूरा नहीं होगा, और ऐसे में उन्हें जमानत दी जानी चाहिए।
अदालत ने पाया कि कुंतल घोष पहली बार अपराध के आरोपी हैं, और उनकी हिरासत का समय उनकी संभावित सजा का एक-तिहाई है। अदालत ने उनकी याचिका स्वीकार करते हुए उन्हें जमानत दी।
मामला: कुंतल घोष बनाम प्रवर्तन निदेशालय (कोलकाता ज़ोनल ऑफिस-II)
प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता: अधिवक्ता जॉयदीप बिस्वास, मृत्युंजय चटर्जी, देबरोप मजूमदार, कौशिक घोष और विक्टर चटर्जी।
- उत्तरदाता: अधिवक्ता फिरोज एडुलजी और अनामिका पांडे।





