DR. SAIYYADA ASHARFI RAHMAN: 3 कोशिश में वजीरपुर की बेटी ने रचा इतिहास, संघर्ष से सफलता तक का भावुक सफर

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DR. SAIYYADA ASHARFI RAHMAN हजार आंधियों के बावजूद खिला वह फूल, जो किस्मत में था चमकनाहजार बिजली गिरे लाख आंधियां उठें, वो फूल खिल के रहेंगे जो खिलने वाले हैं…”यह शेर सिर्फ एक पंक्ति नहीं, बल्कि उस अटूट हौसले की पहचान है जिसने दिल्ली के वजीरपुर जेजे कॉलोनी की एक साधारण सी बेटी को असाधारण मुकाम तक पहुंचा दिया।

DR. SAIYYADA ASHARFI RAHMAN
DR. SAIYYADA ASHARFI RAHMAN

अल्हम्दुलिल्लाह! बेहद खुशी और फख्र के साथ यह खबर सामने आई है कि इसी मिट्टी में जन्म लेने वाली और दिल्ली की फिजाओं में परवरिश पाने वाली डॉ. सय्यदा अश्रफी रहमान ने मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) की कठिन परीक्षा को तीसरी कोशिश में क्रैक कर अपने ख्वाब को हकीकत में बदल दिया।

यह सफलता सिर्फ एक परीक्षा पास करने की कहानी नहीं है, बल्कि सब्र, इस्तिकामत (दृढ़ता), मेहनत और दुआओं से लिखी गई एक ऐसी दास्तान है, जो हर उस छात्र के दिल को छू जाएगी जो अपने सपनों के लिए संघर्ष कर रहा है।

DR. SAIYYADA ASHARFI RAHMAN का वजीरपुर की गलियों से रूस तक – सपनों का लंबा सफर

दिल्ली के वजीरपुर जेजे कॉलोनी की तंग गलियों से निकलकर रूस जैसे दूर देश में एमबीबीएस की पढ़ाई करना अपने आप में किसी चुनौती से कम नहीं। सीमित संसाधन, सामाजिक दबाव और आर्थिक चुनौतियों के बावजूद अश्रफी रहमान ने कभी अपने लक्ष्य से नजर नहीं हटाई।

बचपन से ही पढ़ाई में तेज और डॉक्टर बनने का सपना संजोए अश्रफी ने समझ लिया था कि यह राह आसान नहीं होगी। लेकिन उन्होंने यह भी तय कर लिया था कि मुश्किलें चाहे कितनी भी आएं, वह पीछे नहीं हटेंगी। रूस में पढ़ाई के दौरान भाषा की बाधा, नए माहौल में ढलना, कड़े शैक्षणिक मानदंड और घर से दूर रहने की तन्हाई – इन सबने कई बार उनकी परीक्षा ली। मगर हर कठिनाई ने उन्हें और मजबूत बनाया।

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DR. SAIYYADA ASHARFI RAHMAN की तीसरी कोशिश – जब हार मान लेना आसान था, पर उन्होंने हिम्मत चुनी

एमसीआई की परीक्षा को भारत की सबसे चुनौतीपूर्ण मेडिकल परीक्षाओं में गिना जाता है। कई प्रतिभाशाली छात्र भी इसे पहली बार में पास नहीं कर पाते। अश्रफी रहमान ने भी पहली और दूसरी कोशिश में सफलता नहीं पाई। यह वह पल था जब कोई भी व्यक्ति टूट सकता था, अपने सपनों को छोटा कर सकता था या रास्ता बदल सकता था।

लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।

उन्होंने खुद को संभाला, गलतियों का विश्लेषण किया, पढ़ाई के तरीके बदले, और पहले से ज्यादा मेहनत के साथ तीसरी बार मैदान में उतरीं। आखिरकार, वह दिन आया जब उनकी वर्षों की तपस्या रंग लाई और उन्होंने परीक्षा पास कर ली।

यह वही क्षण था जिसके लिए शायद यह शेर कहा गया है…

“हजारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है,
बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा।”

एक पिता का अधूरा सपना, जो बेटी ने पूरा कर दिया DR. SAIYYADA ASHARFI RAHMAN

इस सफलता के पीछे एक भावुक पहलू भी है – उनके वालिद मोहतरम अब इस दुनिया में नहीं हैं।

अगर आज वह जिंदा होते, तो शायद उनकी जुबान से बस यही निकलता
“माशाअल्लाह, माशाअल्लाह, सुबहान अल्लाह… बेटी तुमने मेरा सर ऊंचा कर दिया।”

बताया जाता है कि उन्होंने अपनी जिंदगी की आखिरी सांस तक अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए हर मुमकिन कोशिश की। उनकी मेहनत और कुर्बानियां आज सितारों की तरह चमक रही हैं।

परिवार की दुआ है: DR. SAIYYADA ASHARFI RAHMAN के साथ

“अल्लाह! वालिद मोहतरम की मगफिरत फरमा, उनके दर्जात बुलंद कर और उनकी कब्र को कशादा अता फरमा… आमीन।”

यह सफलता सिर्फ एक बेटी की नहीं, बल्कि उस पिता की भी है जिसने अपने सपनों को अपनी औलाद की आंखों में बसाया था।

परिवार का फख्र – ‘हमारी बेटी ने कर दिखाया’

अश्रफी रहमान की इस कामयाबी ने पूरे परिवार, रिश्तेदारों और जानने वालों का सीना गर्व से चौड़ा कर दिया है। उनकी यह उपलब्धि न सिर्फ उनकी काबिलियत का सबूत है, बल्कि उन शिक्षकों और परिजनों के लिए भी गर्व का कारण है जिन्होंने हर मोड़ पर उनका साथ दिया। घर में खुशी का माहौल है, दुआओं और मुबारकबाद का सिलसिला जारी है। हर कोई यही कह रहा है — “यह तो बस शुरुआत है, अभी बहुत ऊंचाइयां बाकी हैं।”

संघर्ष से मिला संदेश – इरादा मजबूत हो तो मंजिल दूर नहीं

डॉ. अश्रफी की कहानी आज के युवाओं के लिए एक मजबूत पैगाम है:

👉 अगर इरादा पक्का हो,
👉 मेहनत ईमानदार हो,
👉 और सब्र कायम रहे

तो दुनिया की कोई ताकत आपको कामयाबी हासिल करने से रोक नहीं सकती। उनका सफर बताता है कि असफलता अंत नहीं होती; वह सिर्फ सफलता की तैयारी होती है।

DR. SAIYYADA ASHARFI RAHMAN को अब एक नई जिम्मेदारी – इंसानियत की खिदमत का रास्ता

डॉक्टरी की इज्जत मिलना सिर्फ एक पेशा हासिल करना नहीं, बल्कि इंसानियत की सेवा का वादा भी है। डॉ. अश्रफी रहमान अब उस मुकाम पर हैं जहां उनके ज्ञान और हमदर्दी से अनगिनत लोगों को राहत मिलेगी। उम्मीद है कि वह न सिर्फ मरीजों का इलाज करेंगी, बल्कि अपने व्यवहार और करुणा से उनके दिलों को भी सुकून देंगी। यह सफर अब व्यक्तिगत सफलता से आगे बढ़कर सामाजिक जिम्मेदारी में बदल चुका है।

मां-बाप की परवरिश का नतीजा – चमकता हुआ सितारा बनी DR. SAIYYADA ASHARFI RAHMAN

कहा जाता है कि बच्चे माता-पिता की सबसे बड़ी दौलत होते हैं। अश्रफी की सफलता इस बात का प्रमाण है कि सही परवरिश और शिक्षा मिल जाए तो बच्चे आसमान तक पहुंच सकते हैं।

आज वह सचमुच “बाम-ए-उरोज” पर चमकते सितारे की तरह नजर आ रही हैं।

दुआओं के साथ एक नई उड़ान

उनके लिए दिल से यह दुआ निकलती है—

“तेरी रफ्तार पे सूरज की किरण नाज़ करे,
ऐसी परवाज़ दे मालिक कि गगन नाज़ करे।”

अल्लाह ताला उन्हें जिंदगी के हर इम्तेहान में कामयाबी अता करे और वह तरक्की की नई मंजिलें तय करती रहें।

समाज और देश के लिए प्रेरणा बनी DR. SAIYYADA ASHARFI RAHMAN

वजीरपुर जैसी बस्तियों से निकलकर जब कोई बेटी डॉक्टर बनती है, तो वह सिर्फ अपने परिवार का नहीं बल्कि पूरे समाज का नजरिया बदल देती है। ऐसी कहानियां यह साबित करती हैं कि प्रतिभा किसी अमीरी या बड़े शहर की मोहताज नहीं होती – उसे सिर्फ अवसर और हौसले की जरूरत होती है। डॉ. अश्रफी रहमान आज उन हजारों बेटियों के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं जो बड़े सपने देखने से डरती हैं।

एक बार फिर, दिल से मुबारकबाद

बरसों की अनथक मेहनत, रात-दिन की जद्दोजहद, और सब्र का यह फल सचमुच काबिल-ए-तारीफ है। हम दुआ करते हैं कि उनका भविष्य रोशन हो, वह इसी तरह मुल्क और कौम का नाम रोशन करती रहें और जरूरतमंदों के लिए उम्मीद की किरण बनें।

एक बार फिर इस शानदार कामयाबी पर ढेरों मुबारकबाद!

आखिर में यही कहना मुनासिब होगा….

“मेहनत की लौ से जो चराग जलते हैं,
वो आंधियों में भी बुझाया नहीं करते…
जो ख्वाब सच्चे हों,
वो आखिर हकीकत बन ही जाते हैं।”

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