SUPREME COURT: सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि जब प्राथमिकी (FIR) में आरोपी के बेईमान आचरण का आरोप लगाया गया हो, और यह आरोप जांच सामग्री द्वारा समर्थित हो, तो एक संज्ञेय अपराध की संभावना को उजागर करने वाले मामले में FIR को रद्द नहीं किया जाना चाहिए। यह निर्णय एक आपराधिक अपील की सुनवाई के दौरान लिया गया, जिसमें हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी गई थी, जिसमें हाई कोर्ट ने आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 482 के तहत FIR को रद्द कर दिया था।
SUPREME COURT: मामले का संक्षिप्त विवरण
इस मामले में, न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने मामले की गहन समीक्षा की। अपीलकर्ता ने CrPC की धारा 156(3) के तहत एक शिकायत दर्ज की थी। शिकायत में अपीलकर्ता ने बताया कि प्रतिवादी 2 और 3 (आरोपी) ने उसके ट्रक को एक अनुबंध के तहत किराए पर लिया था और पहले महीने का किराया समय पर दिया था, लेकिन इसके बाद उन्होंने लगातार आश्वासन के बावजूद बाकी की राशि का भुगतान नहीं किया।
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) ने इस मामले में पुलिस को जांच का निर्देश दिया। जब आरोपी पेश नहीं हुए, तो CJM ने उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किए। इसके बाद, आरोपियों ने CrPC की धारा 482 के तहत कार्यवाही को रद्द करने की मांग की, यह दावा करते हुए कि कोई अनुबंध निष्पादित नहीं किया गया था और इसलिए कोई आपराधिक अपराध नहीं हुआ।
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SUPREME COURT: हाई कोर्ट का निर्णय
हाई कोर्ट ने याचिका की सुनवाई के दौरान CJM द्वारा संज्ञान लेने और प्रक्रिया जारी करने के फैसले को रद्द कर दिया। अदालत ने अपीलकर्ता को दीवानी उपचारों का पालन करने की सलाह दी, जिससे यह संकेत मिलता है कि कोर्ट इस मामले को आपराधिक दृष्टिकोण से नहीं देख रहा था।
सुप्रीम कोर्ट ने इस संदर्भ में कई महत्वपूर्ण बातें कही। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब यह तय किया जा रहा हो कि किसी आपराधिक कार्यवाही या FIR को प्रारंभिक स्तर पर रद्द किया जाना चाहिए या नहीं, उस समय FIR, पुलिस रिपोर्ट, शिकायत, और जांच के दौरान एकत्र की गई सामग्रियों को उनके चेहरे के मूल्य पर लिया जाना चाहिए।
न्यायालय ने कहा, “इस स्तर पर आरोपों की सत्यता का परीक्षण नहीं किया जाना चाहिए।” FIR को सभी आरोपों का विश्वकोश नहीं माना जाना चाहिए, बल्कि यह देखने के लिए कि क्या FIR किसी संज्ञेय अपराध को उजागर करती है, आरोपों में निहित गंभीरता का मूल्यांकन किया जाना चाहिए।
SUPREME COURT: FIR और जांच प्रक्रिया
अदालत ने यह भी बताया कि पुलिस रिपोर्ट का समर्थन करने वाले सामग्रियों पर ध्यान देना अनिवार्य है। यदि यह सिद्ध होता है कि FIR में किसी प्रकार का संज्ञान योग्य अपराध हुआ है, तो इसे रद्द करने का कोई औचित्य नहीं है।
अदालत ने आगे कहा कि जांच के दौरान एकत्र की गई सामग्रियों को देखे बिना FIR को प्रारंभिक स्तर पर रद्द करने का कोई औचित्य नहीं था। इससे यह स्पष्ट हुआ कि अदालत ने किसी भी तरह की अनावश्यक रुकावट को अस्वीकार किया।
SUPREME COURT: उच्च न्यायालय को निर्देश
अंततः, सुप्रीम कोर्ट ने मामले को हाई कोर्ट के पास पुनः भेज दिया और निर्देश दिया कि वह जांच एजेंसी द्वारा एकत्र की गई सामग्रियों पर विचार करने के बाद याचिका पर कानून के अनुसार पुनर्विचार करे। इससे यह भी स्पष्ट हुआ कि उच्च न्यायालय को आगे की कार्यवाही में कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करना होगा।
इस प्रकार, सुप्रीम कोर्ट ने अपील को मंजूरी दे दी और कहा कि जब FIR में बेईमानी का आरोप हो, तो इससे होने वाली जांच को बाधित नहीं किया जाना चाहिए। इस फैसले से यह संकेत मिलता है कि कोर्ट प्रबंधन और कानूनी प्रक्रियाओं को प्राथमिकता देने के लिए तत्पर है।
SUPREME COURT: मामला शीर्षक:
Somjeet Mallick बनाम झारखंड राज्य (तटस्थ उद्धरण: 2024 INSC 772)





