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KARNATAKA HC: आंशिक बंटवारे पर अविभाजित संपत्ति सभी सदस्यों की संयुक्त हिस्सेदारी होगी

हाई कोर्ट ने सुनाया बड़ा फेसला 2024 10 10T145413.336

KARNATAKA HC: कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक मामले में महत्वपूर्ण निर्णय दिया है कि अगर उत्तराधिकार से मिली संपत्तियों का आंशिक बंटवारा होता है, तो अविभाजित

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KARNATAKA HC: कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक मामले में महत्वपूर्ण निर्णय दिया है कि अगर उत्तराधिकार से मिली संपत्तियों का आंशिक बंटवारा होता है, तो अविभाजित संपत्ति सभी सदस्यों के पास “साझा स्वामित्व” (tenants in common) के रूप में रहेगी। यह निर्णय एक अपील पर सुनवाई के दौरान दिया गया, जो कि अतिरिक्त सिटी सिविल और सत्र न्यायाधीश द्वारा एक मामले को “सुनवाई योग्य” न मानते हुए खारिज करने के आदेश के खिलाफ थी।

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इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति श्रीनिवास हरीश कुमार और न्यायमूर्ति उमेश एम. अडिगा की खंडपीठ ने की, जिसमें उन्होंने स्पष्ट किया कि “धारा की भाषा से यह अर्थ निकलता है कि यह उत्तराधिकार में प्राप्त संपत्तियों पर लागू होती है, विशेष रूप से हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत पुरुष या महिला द्वारा प्राप्त स्वअर्जित या व्यक्तिगत संपत्तियों पर। अगर ऐसे में संपत्ति का आंशिक बंटवारा होता है, तो अविभाजित संपत्ति सभी उत्तराधिकारियों के बीच साझा स्वामित्व के रूप में रहेगी।”

पीठ ने यह भी जोड़ा कि सहभागिता संपत्ति (coparcenary property) के मामले में, यदि आंशिक बंटवारा होता है, तो अविभाजित संपत्ति साझीदारों के बीच साझा स्वामित्व में रहेगी। वहीं तीसरे पक्ष, जो इस सहभागिता का हिस्सा नहीं हैं, के लिए यह संपत्ति साझीदारों के स्वामित्व में ही मानी जाएगी, जबकि सहभागिता सदस्य इसे “संयुक्त स्वामित्व” (joint tenants) के रूप में रखेंगे।

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KARNATAKA HC: मामले का पृष्ठभूमि

इस मामले में अपीलकर्ता जयश्री जयंत ने अपने परिवार की संपत्तियों में 1/8 हिस्सेदारी की मांग करते हुए बंटवारे का मुकदमा दायर किया था। यह संपत्ति उनके परदादा बोरे गौड़ा के हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) की थी, जिनकी दो बेटियां और एक पुत्र पी.बी. नंजैया थे। पी.बी. नंजैया की दूसरी पत्नी लिंगम्मल के तीन बेटे थे: रामू गौडर, चंदप्पा, और कृष्णास्वामी (जो इस मामले में पहले प्रतिवादी हैं)।

जयश्री ने अदालत में यह दावा किया कि उन्हें अपने हिस्से से वंचित रखा गया है और कई बंटवारा दस्तावेजों में कानूनी व्याख्याओं के कारण भ्रम हुआ है। पहले प्रतिवादी कृष्णास्वामी ने कहा कि परिवार की सभी संपत्तियां स्व-अर्जित थीं और उनका कोई संबंध पुरानी पैतृक संपत्तियों से नहीं है। साथ ही, विभाजन सही तरीके से हुआ है, जिससे अपीलकर्ता को किसी हिस्से का दावा नहीं हो सकता।

प्राथमिक अदालत ने 2016 में इस मामले को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह दावा बनाए रखने योग्य नहीं है और विशेष रूप से हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 6 और 8 के सिद्धांतों का पालन करते हुए इसे खारिज कर दिया गया। इस फैसले के खिलाफ जयश्री ने हाईकोर्ट में अपील की, जिसमें उन्होंने इस पर पुनर्विचार की मांग की।

KARNATAKA HC: हाईकोर्ट का निर्णय और दृष्टिकोण

हाईकोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के दौरान “पी.चेरदप्पा पाई बनाम कृषि आयकर अधिकारी (AIR 1970 MYS 168)” मामले पर भरोसा किया। इस संदर्भ में अदालत ने कहा कि “किसी संपत्ति के अविभाजित हिस्से के मामले में यह मान्यता होती है कि परिवार के सदस्य इसे साझा स्वामित्व (tenants in common) के रूप में रखेंगे, जब तक कि इसे संयुक्त स्वामित्व (joint tenants) के रूप में रखने का कोई विशेष समझौता सिद्ध न हो जाए।

अदालत ने कहा कि अगर सहभागिता संपत्ति का आंशिक बंटवारा होता है, तो प्रत्येक सदस्य का हिस्सा उसकी संतानों के लिए पैतृक संपत्ति माना जाएगा, जबकि इसे अन्य विभाजित सदस्यों के संबंध में अलग संपत्ति के रूप में देखा जाएगा।

अदालत ने यह भी कहा, “अगर इस मामले के निर्विवाद तथ्यों को देखा जाए, तो 1955 और 1966 के विभाजनों में प्रतिवादी संख्या 5 से 19 को सूट से बाहर रखा गया है, प्लेइन्ट की अनुसूची की वस्तुओं 1 से 3 को छोड़कर।

पहले प्रतिवादी का यह तर्क था कि वस्तुएं 1 से 3 के अलावा अन्य संपत्तियां स्व-अर्जित थीं और इसलिए अपीलकर्ता को विभाजन का दावा करने का अधिकार नहीं था क्योंकि पहला प्रतिवादी धारा 8 के तहत उत्तराधिकार प्राप्त हुआ है। दूसरी ओर, याचिकाकर्ता का यह दावा था कि अनुसूची की वस्तुओं 1 से 3 से प्राप्त आय का उपयोग अन्य अनुसूचित संपत्तियों के अधिग्रहण के लिए किया गया था।”

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KARNATAKA HC: हाईकोर्ट का अंतिम निष्कर्ष

हाईकोर्ट ने अंततः निष्कर्ष निकाला कि प्रतिवादी संख्या 5 से 19 को मुकदमे से पूरी तरह से बाहर नहीं रखा जा सकता है, जहां तक अनुसूची की वस्तुएं 1 से 3 का सवाल है। अदालत ने पाया कि इस सीमा तक मुकदमा बरकरार रहना चाहिए ताकि याचिकाकर्ता के बंटवारे के अधिकार की पुष्टि हो सके। इस प्रकार, हाईकोर्ट ने अपील को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया और विवादित आदेश में संशोधन किया।

मामला शीर्षक: जयश्री जयंत बनाम एन. कृष्णास्वामी और अन्य (न्यूट्रल संदर्भ: 2024:KHC:42467-DB)
प्रतिनिधित्व:

  • अपीलकर्ता: जयंत बालकृष्ण
  • प्रतिवादी: वरिष्ठ अधिवक्ता धनंजय जोशी, अधिवक्ता कश्यप एन. नाइक, एस.एच. प्रशांत, जयकुमार एन.डी., और अक्षय बी.एम.

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