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KERALA HC: आत्महत्या के आरोप से बरी होने पर क्रूरता के आरोप से राहत नहीं

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KERALA HC: केरल हाईकोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 306 के तहत आत्महत्या के लिए उकसाने के

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KERALA HC: केरल हाईकोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 306 के तहत आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप से बरी होना, धारा 498A के तहत क्रूरता के आरोप से बरी होने का आधार नहीं बनता क्योंकि दोनों अलग-अलग अपराध हैं। न्यायमूर्ति सोफी थॉमस की एकल पीठ ने एक मामले की सुनवाई करते हुए यह बात कही, जिसमें अभियुक्त ने धारा 498A के तहत दी गई सजा को चुनौती दी थी।

KERALA HC

अदालत ने कहा, “धारा 306 और 498A के तहत अपराध अलग-अलग हैं, इसलिए इनके लिए अलग-अलग आरोप लगाए जाने चाहिए। धारा 306 और 498A के तहत एक साथ आरोप लगाए जा सकते हैं और दोनों में अलग-अलग सजा भी दी जा सकती है। धारा 306 के तहत बरी होने का मतलब यह नहीं है कि अभियुक्त को धारा 498A के तहत भी बरी किया जाएगा या इसके विपरीत भी यही लागू होता है।”

KERALA HC: मामले के तथ्य

अभियुक्त के खिलाफ धारा 306 के तहत चार्जशीट दाखिल की गई थी। अभियोजन के अनुसार, अभियुक्त और मृतका के बीच लिव-इन संबंध था और उसने 2005 में मृतका को आत्महत्या के लिए उकसाया था। मामले की सुनवाई के दौरान, अभियुक्त ने आत्महत्या के आरोप से इनकार किया और कहा कि वे दोनों प्रेम में थे और उनके दो बच्चे भी थे।

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उसने बताया कि मृतका ने एक पड़ोसी महिला के खिलाफ कुछ अपमानजनक टिप्पणी की थी, जिसके कारण उसने उसे डांटा था। एक दिन जब वह काम पर गया हुआ था, उसकी पत्नी ने जहर खाकर आत्महत्या कर ली।

निचली अदालत ने आत्महत्या के आरोप के लिए पर्याप्त सबूत न मिलने पर उसे धारा 306 से बरी कर दिया। लेकिन गवाहों की गवाही के आधार पर अदालत ने पाया कि अभियुक्त ने मानसिक और शारीरिक रूप से अपनी पत्नी के साथ क्रूरता की थी, जो धारा 498A के तहत अपराध माना गया और उसे इस अपराध में दोषी ठहराया गया।

KERALA HC: हाईकोर्ट में अपील

अभियुक्त ने हाईकोर्ट में इस फैसले को चुनौती दी। हाईकोर्ट ने सबूतों का अवलोकन करते हुए कहा कि ऐसा कोई विशेष आरोप नहीं था जिससे यह साबित हो कि मृतका ने आत्महत्या क्रूरता के कारण की थी। गवाह ने यह जरूर कहा था कि अभियुक्त मृतका के साथ मारपीट करता था, लेकिन इसके संबंध में कभी कोई शिकायत दर्ज नहीं की गई थी।

अदालत ने यह भी माना कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि मृतका को क्रूरता या प्रताड़ना दी गई थी। अदालत ने यह भी कहा कि अभियुक्त और मृतका के बीच विवाह नहीं हुआ था, वे लिव-इन संबंध में थे, इसलिए धारा 498A को इस मामले में लागू नहीं किया जा सकता।

अदालत ने निष्कर्ष दिया कि अभियुक्त के खिलाफ धारा 306 का आरोप होने के बावजूद उसे धारा 498A का अवसर नहीं मिला और उसे इस आरोप के लिए बचाव का मौका भी नहीं मिला। इसलिए, यह न्याय में चूक है। अंततः, अदालत ने अपील स्वीकार कर ली और अभियुक्त की धारा 498A के तहत दोषसिद्धि को रद्द कर दिया।

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मामला शीर्षक: सुरेश बनाम केरल राज्य (न्यूट्रल संदर्भ: 2024: KER: 80744)

पक्षकारों की उपस्थिति:
अपीलकर्ता: अधिवक्ता रंजीत बी. मरार और प्रभु विजयकुमार
प्रतिवादी: लोक अभियोजक एम.सी. आशी

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