MADRAS HC: मद्रास हाईकोर्ट ने कम्मावर समाज नला संघम द्वारा दायर उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें गांवों में शवयात्रा के लिए सार्वजनिक सड़कों के उपयोग पर रोक लगाने की मांग की गई थी। इस याचिका को “गैर जिम्मेदार” बताते हुए कोर्ट ने याचिकाकर्ता पर 25,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया।
MADRAS HC: मामला
यह याचिका, एक विशेष समुदाय के संगठन कम्मावर समाज नला संघम द्वारा दायर की गई थी, जिसमें याचिकाकर्ता ने यह तर्क दिया था कि शवयात्राओं के कारण गांवों की आवासीय सड़कों पर सार्वजनिक यातायात में रुकावट उत्पन्न हो रही है। यह रुकावट न केवल निवासियों के लिए असुविधा का कारण बन रही थी, बल्कि यह एक सार्वजनिक समस्या भी बन चुकी थी।
याचिकाकर्ता ने सरकारी अधिकारियों से यह निर्देश देने की मांग की थी कि शवयात्रा को मुख्य सड़क या अन्य सामान्य रास्तों से निकाला जाए, न कि गांवों की संकीर्ण और आवासीय सड़कों से।
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इस याचिका को लेकर, मद्रास हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति एम.एस. रामेश और न्यायमूर्ति ए.डी. मारिया क्लेटे की खंडपीठ ने विचार किया और फैसला सुनाया। कोर्ट ने पहले इस याचिका को “गैर जिम्मेदार” करार दिया और कहा कि याचिकाकर्ता का यह कदम गांवों के बीच अशांति पैदा करने का कारण बन सकता है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता पर जुर्माना लगाया और आदेश दिया कि 25,000 रुपये की राशि मदुरै बेंच के कानूनी सेवा समिति को अदा करनी होगी।
MADRAS HC: कोर्ट का विचार
कोर्ट ने इस मामले की गंभीरता को समझते हुए याचिकाकर्ता की दलीलें अस्वीकार कीं। खंडपीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 15 के तहत, इस तरह की याचिकाएं भेदभावपूर्ण हैं, क्योंकि यह विशेष रूप से एक समुदाय की गतिविधियों को लक्षित करती हैं, जबकि सार्वजनिक सड़कों का उपयोग सभी के लिए समान है, चाहे वे किसी भी जाति, धर्म या समुदाय से संबंधित हों। कोर्ट ने कहा कि यह याचिका एक प्रकार का भेदभाव उत्पन्न करती है और यह संविधान के प्रावधानों के खिलाफ है।
खंडपीठ ने यह भी टिप्पणी की कि कम्मावर समाज नला संघम, जो एक जिम्मेदार संगठन है, को इस तरह के विवादास्पद मुद्दों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए था। कोर्ट ने कहा कि यह संगठन केवल अपने समुदाय के कल्याण के लिए काम करना चाहिए और इस तरह के मुद्दों को उठाकर गांवों में अशांति पैदा करने का प्रयास नहीं करना चाहिए।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सार्वजनिक सड़कें और गांवों की सड़कें सभी के लिए खुली हैं और इन्हें सभी निवासियों के लिए समान रूप से उपयोग किया जा सकता है। किसी विशेष समुदाय को यह अधिकार नहीं है कि वह इन सार्वजनिक सड़कों पर शवयात्राओं को प्रतिबंधित करने की मांग करें। न्यायमूर्ति रामेश और न्यायमूर्ति क्लेटे ने कहा कि यदि इस तरह की याचिका को स्वीकार किया जाता, तो यह गांवों में सांप्रदायिक तनाव और अशांति का कारण बन सकता था।
MADRAS HC: संविधानिक दृष्टिकोण
कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत याचिका में जो तर्क दिए गए थे, वे संविधान के अनुच्छेद 15 का उल्लंघन करते थे। अनुच्छेद 15 के तहत, भारतीय नागरिकों को किसी भी प्रकार के भेदभाव से बचाने के लिए प्रावधान है, और सार्वजनिक सड़कों पर शवयात्राओं के लिए रास्ते की मांग करना किसी समुदाय के खिलाफ भेदभावपूर्ण कदम हो सकता है।
इसके अलावा, कम्मावर समाज नला संघम का इस तरह की याचिका दायर करना, कोर्ट के अनुसार, उनके संगठन की जिम्मेदारी के विपरीत था। अदालत ने इस संगठन से अपेक्षाएं जताईं कि वह केवल अपने समुदाय के कल्याण के कार्यों को बढ़ावा दे, न कि इस प्रकार के विवादास्पद मुद्दों को उछाल कर गांवों में तनाव पैदा करने का प्रयास करे।
MADRAS HC: अंतिम निर्णय
कोर्ट ने इस मामले में याचिका खारिज करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता के पास इस मामले में कोई कानूनी अधिकार नहीं है और न ही उसे कोई विशेषाधिकार प्राप्त है, जिससे वह सार्वजनिक सड़कों पर शवयात्रा की अनुमति को रोक सके।
इसके परिणामस्वरूप, कोर्ट ने याचिकाकर्ता पर जुर्माना लगाया और आदेश दिया कि यह राशि मदुरै बेंच के कानूनी सेवा समिति को अदा की जाए। जुर्माना राशि 25,000 रुपये की होगी, जिसे याचिकाकर्ता को 15 दिनों के भीतर अदा करना होगा।
इस निर्णय से यह स्पष्ट होता है कि अदालत ने किसी भी प्रकार की सामाजिक असंतुलन और भेदभाव को बढ़ावा देने वाली याचिकाओं को गंभीरता से लिया और उचित कानूनी मार्गदर्शन प्रदान किया।
मामला: कम्मावर समाज नला संघम बनाम जिला कलेक्टर
संदर्भ: 2024: MHC: 3852
अधिवक्ता:
- याचिकाकर्ता: अधिवक्ता I. वेलप्रदीप
- प्रतिवादी: सरकारी वकील P. थिलक्कुमार
Regards:- Adv.Radha Rani for LADY MEMBER EXECUTIVE in forthcoming election of Rohini Court Delhi





