SUPREME COURT: सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह कहा है कि टूटी अवधि (ब्रोकन पीरियड) पर ब्याज को पूंजीगत व्यय के रूप में नहीं माना जा सकता, जब प्रतिभूतियों को स्टॉक-इन-ट्रेड के रूप में रखा जाता है। इस मामले में मुख्य मुद्दा टूटी अवधि के ब्याज के लिए दी जाने वाली कटौती से संबंधित था, और यह सवाल उठाया गया था कि क्या इस अवधि के ब्याज की कटौती का दावा किया जा सकता है।
SUPREME COURT: मामले के तथ्य
इस मामले में अपीलकर्ता एक अनुसूचित बैंक था, जो सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद और बिक्री करता था। बैंक ने इन प्रतिभूतियों को स्टॉक-इन-ट्रेड के रूप में माना और उनके बिक्री से प्राप्त आय को अपनी व्यावसायिक आय की गणना के लिए इस्तेमाल किया। बैंक ने लगातार यह तरीका अपनाया कि प्रतिभूतियों की खरीद पर भुगतान किए गए ब्याज (टूटी अवधि का ब्याज) को प्रतिभूतियों की बिक्री पर प्राप्त ब्याज से घटाकर, शुद्ध ब्याज आय कर के लिए प्रस्तुत की गई। इस प्रकार, यदि प्रतिभूतियों की पूरी खरीद मूल्य को, जिसमें टूटी अवधि का ब्याज भी शामिल है, कटौती के रूप में स्वीकार कर लिया जाता है, तो प्रतिभूतियों की पूरी बिक्री कीमत को आय की गणना में शामिल किया जाएगा।
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निर्धारण अधिकारी ने इस प्रथा को स्वीकार किया और आकलन वर्षों 1990-91 से 1992-93 तक नियमित आकलन आदेश पारित करते हुए इसकी अनुमति दी। हालांकि, आयकर आयुक्त (सीआईटी) ने आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 263 के तहत अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते हुए इस आकलन आदेशों में हस्तक्षेप किया। सीआईटी ने फैसला सुनाया कि बैंक टूटी अवधि के ब्याज की कटौती का हकदार नहीं है, और इस फैसले से असंतुष्ट होकर बैंक ने आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (आईटीएटी) में अपील दायर की।
आईटीएटी ने अपील को स्वीकार कर लिया, लेकिन हाईकोर्ट ने विभाग की अपील को स्वीकारते हुए आईटीएटी के आदेश को पलट दिया। इसके बाद, बैंक सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष आया।
SUPREME COURT: सुप्रीम कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट की दो-न्यायाधीशों की पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति अभय एस. ओका और न्यायमूर्ति पंकज मित्थल शामिल थे, ने इस मामले की सुनवाई की। पीठ ने फैसला सुनाया कि चूंकि प्रतिभूतियों को स्टॉक-इन-ट्रेड के रूप में माना गया था, इसलिए टूटी अवधि पर ब्याज को पूंजीगत व्यय के रूप में नहीं माना जा सकता और इसे राजस्व व्यय के रूप में माना जाएगा, जिसे कटौती के रूप में अनुमति दी जा सकती है।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि टूटी अवधि के ब्याज पर कटौती की अनुमति नहीं दी जाती, तो इस ब्याज को पूंजीगत खर्च के रूप में प्रतिभूतियों की अधिग्रहण लागत में जोड़ा जाएगा, जिसे बाद में इन प्रतिभूतियों की बिक्री से प्राप्त आय में से घटाया जाएगा। इससे यह निष्कर्ष निकाला गया कि टूटी अवधि पर ब्याज का व्यय राजस्व व्यय है, और इसे आयकर अधिनियम के तहत कटौती योग्य माना जाएगा।
SUPREME COURT: न्यायिक टिप्पणियां
सुप्रीम कोर्ट ने अपनी टिप्पणियों में कहा कि “प्रिवी काउंसिल और इस कोर्ट ने लगातार यह माना है कि बैंक जिन प्रतिभूतियों का अधिग्रहण करते हैं, उन्हें निवेश के रूप में नहीं, बल्कि स्टॉक-इन-ट्रेड के रूप में माना जाता है।” कोर्ट ने यह भी कहा कि टूटी अवधि के ब्याज की राशि को लाभ से घटाया जाएगा, और विभाग द्वारा किया गया प्रयास मात्र शैक्षिक अभ्यास है।
कोर्ट ने एचटीएम (होल्ड टू मैच्योरिटी) श्रेणी की प्रतिभूतियों के बारे में चर्चा करते हुए कहा कि ये आमतौर पर लंबे समय तक रखी जाती हैं, जब तक कि वे परिपक्व न हो जाएं। इसलिए, ऐसी प्रतिभूतियों को आमतौर पर उनकी लागत मूल्य या नाममात्र मूल्य पर आंका जाता है।
SUPREME COURT: क्या एचटीएम प्रतिभूतियां निवेश मानी जाएंगी?
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि एचटीएम प्रतिभूतियों को निवेश के रूप में तब माना जा सकता है, जब उन्हें वास्तव में परिपक्वता तक रखा गया हो और उनसे पहले हस्तांतरित नहीं किया गया हो, और जब उन्हें उनकी लागत या नाममात्र मूल्य पर खरीदा गया हो। यदि यह पाया जाता है कि एचटीएम प्रतिभूतियों को निवेश के रूप में रखा गया था, तो टूटी अवधि के ब्याज का लाभ उपलब्ध नहीं होगा। इसके विपरीत स्थिति तब होगी जब प्रतिभूतियों को व्यापारिक संपत्ति के रूप में माना जाएगा।
चूंकि इस मामले में प्रतिभूतियों को स्टॉक-इन-ट्रेड के रूप में रखा गया था, इसलिए उनकी आय आयकर अधिनियम की धारा 28 के तहत कर योग्य थी। आकलन अधिकारी ने भी इस तथ्य को स्वीकार किया कि धारा 18 से 21 के निरसन को ध्यान में रखते हुए, प्रतिभूतियों पर ब्याज धारा 28 के अनुसार कर योग्य होगा। आकलन अधिकारी ने यह भी देखा कि अपीलकर्ता-बैंक ने अपनी पुस्तकों और वार्षिक रिपोर्ट में वास्तविक रूप से प्राप्त ब्याज के आधार पर कर की पेशकश की थी, न कि देयता के आधार पर।
SUPREME COURT: कोर्ट का निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट ने टूटी अवधि के ब्याज को पूंजीगत व्यय मानने के विभाग के तर्क को खारिज कर दिया। न्यायालय ने कहा कि उच्च न्यायालय ने सही तरीके से विभाग के इस तर्क को खारिज किया कि प्रतिभूतियों की खरीद पर किया गया खर्च पूंजीगत व्यय था।
अतः, सुप्रीम कोर्ट ने अपीलों को स्वीकार किया, उच्च न्यायालय के विवादित फैसले को रद्द कर दिया, और आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (आईटीएटी) के निर्णय को बहाल किया।
SUPREME COURT: महत्वपूर्ण मामला शीर्षक
बैंक ऑफ राजस्थान लिमिटेड बनाम आयकर आयुक्त (तटस्थ उद्धरण: 2024 INSC 781)
पक्षकारों की उपस्थिति:
अपीलकर्ता की ओर से: एओआर राज बहादुर यादव
प्रतिवादी की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता रुपेश कुमार, संजय झांवर, और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एन. वेंकटरमन.





