बीमाधारकों को राहत: नई दिल्ली, 6 मई 2025: सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि बीमा क्लेम के मामलों में यदि बीमित पक्ष यह दावा करता है कि फुल एंड फाइनल सेटलमेंट (पूर्ण और अंतिम निपटान) जबरदस्ती या धोखाधड़ी से कराया गया है, तो ऐसा विवाद भी मध्यस्थता के लिए योग्य है।
इस फैसले से उन बीमाधारकों को बड़ी राहत मिली है, जो यह महसूस करते हैं कि उन्हें बीमा कंपनियों द्वारा दबाव में लाकर सेटलमेंट के लिए मजबूर किया गया।
यह निर्णय जस्टिस अभय एस. ओका और जस्टिस उज्जल भुयान की पीठ ने सुनाया। पीठ ने कहा कि यदि अपीलकर्ता यह आरोप लगाता है कि डिस्चार्ज वाउचर (रसीद) पर हस्ताक्षर दबाव या अनुचित प्रभाव में आकर किए गए थे, तो इसका निर्णय मध्यस्थता ट्राइब्यूनल द्वारा किया जाना चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसी परिस्थितियों में फुल एंड फाइनल सेटलमेंट कोई बाधा नहीं बनती है।
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यह मामला एक मांस प्रसंस्करण व्यवसायी से जुड़ा है, जिसे बाढ़ के कारण भारी नुकसान हुआ था। व्यवसायी ने बीमा कंपनी से दावा किया, लेकिन बाद में उसे एक निश्चित राशि पर “फुल एंड फाइनल सेटलमेंट” के नाम पर वाउचर पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर किया गया। अपीलकर्ता ने दावा किया कि यह हस्ताक्षर दबाव और जबरदस्ती के तहत कराए गए।
सेटलमेंट वाउचर पर हस्ताक्षर करने के कुछ ही समय बाद, अपीलकर्ता ने बीमा पॉलिसी में निहित मध्यस्थता खंड के तहत न्याय मांगने के लिए पहल की। हालांकि, बीमा कंपनी ने इसे चुनौती दी और मामला हाईकोर्ट में पहुंचा, जहां अदालत ने कहा कि सेटलमेंट स्वीकार करने के बाद अपीलकर्ता को आगे कोई दावा करने का अधिकार नहीं है।
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सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप
हाईकोर्ट के फैसले से असंतुष्ट होकर अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का निर्णय रद्द कर दिया और कहा कि इस प्रकार के विवाद भी मध्यस्थता के योग्य हैं, खासकर जब जबरदस्ती या धोखाधड़ी का आरोप हो।
जस्टिस उज्जल भुयान द्वारा लिखे गए निर्णय में कहा गया: “एक पूर्ण और अंतिम निपटान रसीद या डिस्चार्ज वाउचर पर हस्ताक्षर, अगर जबरदस्ती, धोखाधड़ी या अनुचित प्रभाव के आरोप के तहत किए गए हैं, तो यह मध्यस्थता को समाप्त नहीं करता। ऐसा विवाद मध्यस्थता के दायरे में आता है।”
कानूनी संदर्भ और उदाहरण
फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने SBI जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम कृषी स्पिनिंग (2024 Livelaw SC 489) केस का उल्लेख किया। इस मामले में भी यही स्थापित किया गया था कि मध्यस्थता समझौता सिर्फ इसलिए समाप्त नहीं होता क्योंकि एक पक्ष ने कथित तौर पर समझौते के तहत राशि स्वीकार कर ली हो।
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इसके अतिरिक्त, कोर्ट ने विद्या ड्रोलिया बनाम दुर्गा ट्रेडिंग कॉर्पोरेशन केस का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि मध्यस्थता की योग्यता को शुरूआती स्तर (धारा 8 या 11 के तहत) पर खारिज नहीं किया जा सकता जब तक कि यह स्पष्ट रूप से अस्वीकार्य न हो। यदि विवाद की विषयवस्तु मध्यस्थता के लायक है, तो आर्बिट्रल ट्राइब्यूनल को ही यह अधिकार है कि वह अपने अधिकार क्षेत्र और विवाद की वैधता पर निर्णय ले।
कोर्ट नहीं तय करेगा जबरदस्ती का सत्य
सुप्रीम कोर्ट ने कहा: “1996 के मध्यस्थता अधिनियम की धारा 11(6) के तहत, कोर्ट की भूमिका यह सुनिश्चित करना है कि क्या एक मध्यस्थता योग्य विवाद मौजूद है। कोर्ट को यह तय करने की आवश्यकता नहीं है कि जबरदस्ती या धोखाधड़ी का आरोप सही है या नहीं – यह फैसला ट्राइब्यूनल द्वारा ही किया जाएगा।”
अदालत ने माना कि यदि हाईकोर्ट की तरह देखा जाए और ऐसे मामलों को आरंभ में ही खारिज कर दिया जाए, तो इसका परिणाम यह होगा कि प्रभावित पक्ष को अपनी बात रखने का अवसर ही नहीं मिलेगा। इससे न्याय की संभावना ही समाप्त हो जाएगी।
मध्यस्थता की ताकत को सुप्रीम कोर्ट की मान्यता
सुप्रीम कोर्ट ने अंततः अपील को मंजूरी दी और कहा कि:
- बीमा कंपनी और अपीलकर्ता के बीच विवाद मध्यस्थता के दायरे में आता है।
- अपीलकर्ता द्वारा जबरदस्ती से डिस्चार्ज वाउचर पर हस्ताक्षर करने का आरोप एक गंभीर मुद्दा है, जिसे ट्राइब्यूनल द्वारा तय किया जाना चाहिए।
- बीमा कंपनी द्वारा दिए गए ₹28 लाख के सेटलमेंट के बावजूद, अपीलकर्ता द्वारा ₹1.88 करोड़ के दावे पर सुनवाई हो सकती है।
यह फैसला इस बात को रेखांकित करता है कि भारतीय न्याय प्रणाली में मध्यस्थता को एक प्रभावी और निष्पक्ष समाधान प्रक्रिया के रूप में स्वीकार किया जा रहा है। साथ ही, यह उन परिस्थितियों में भी पार्टियों को राहत देता है जहां किसी समझौते को अनुचित तरीके से थोपा गया हो।
इस फैसले का दूरगामी असर बीमा, वाणिज्य और अनुबंधों से जुड़े विवादों पर पड़ेगा, और यह मध्यस्थता को कानूनी अधिकारों की रक्षा का एक सशक्त माध्यम बनाएगा।





