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KERALA HIGH COURT: बिना बीड़ी की फोरेंसिक जांच के यह नहीं कहा जा सकता कि उसमें गांजा था

हाई कोर्ट ने सुनाया बड़ा फेसला 2024 10 14T124631.710

KERALA HIGH COURT: केरल हाईकोर्ट ने एक व्यक्ति के खिलाफ एनडीपीएस (नारकोटिक ड्रग्स और साइकोट्रोपिक सब्सटेंस) अधिनियम, 1985 के तहत चल रही आपराधिक कार्यवाही को

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KERALA HIGH COURT: केरल हाईकोर्ट ने एक व्यक्ति के खिलाफ एनडीपीएस (नारकोटिक ड्रग्स और साइकोट्रोपिक सब्सटेंस) अधिनियम, 1985 के तहत चल रही आपराधिक कार्यवाही को खारिज कर दिया, जिसे कथित रूप से गांजा (कैनबिस) से भरी बीड़ी पीते हुए पकड़ा गया था। हाईकोर्ट ने अभियोजन पक्ष के इस दावे को अस्वीकार कर दिया क्योंकि बीड़ी की फोरेंसिक जांच नहीं की गई थी।

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यह मामला न्यायमूर्ति बेचू कुरियन थॉमस की पीठ के समक्ष क्रिमिनल मिसलेनियस केस के रूप में प्रस्तुत हुआ, जिसमें अभियोजन पक्ष की ओर से इस बात की पुष्टि की गई थी कि बीड़ी की फोरेंसिक जांच के अभाव में यह साबित करना संभव नहीं था कि उसमें गांजा भरा हुआ था।

KERALA HIGH COURT: अभियोजन पक्ष के दावे और अभियोजन का कानूनी आधार

अभियोजन पक्ष ने इस मामले में आरोप लगाया कि आरोपी को गांजा से भरी बीड़ी पीते हुए पकड़ा गया था और इसलिए उसने एनडीपीएस अधिनियम की धारा 27(b) के तहत अपराध किया था। एनडीपीएस अधिनियम की इस धारा के अनुसार, कोई भी व्यक्ति जो मादक पदार्थ का सेवन करता है या उसके पास मादक पदार्थ पाया जाता है, तो उसे दंडनीय माना जाता है। लेकिन, अभियोजन पक्ष ने इस तथ्य को मान्यता दी कि आरोपी द्वारा कथित रूप से पी जा रही बीड़ी की फोरेंसिक जांच नहीं की गई थी, जो कि अभियोजन का कानूनी आधार साबित करने के लिए आवश्यक था।

हाईकोर्ट ने इस पर कहा कि बिना किसी वैज्ञानिक प्रमाण या फोरेंसिक जांच के, यह दावा करना कि बीड़ी में गांजा भरा था, कानूनी तौर पर सही नहीं है। न्यायमूर्ति बेचू कुरियन थॉमस की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, “बीड़ी की किसी भी फोरेंसिक जांच के अभाव में, याचिकाकर्ता के खिलाफ धारा 27(b) के तहत अभियोजन का कोई कानूनी आधार नहीं है।”

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KERALA HIGH COURT: कोर्ट द्वारा दिए गए पूर्व के निर्णय

इससे पहले भी केरल हाईकोर्ट ने इब्नु शिजिल बनाम केरल राज्य (2024) और अनुराग शाजी बनाम केरल राज्य (2023) मामलों में यह निर्णय दिया था कि किसी व्यक्ति की गंध पहचानने की क्षमता केवल संदेह उत्पन्न कर सकती है, लेकिन गंध के आधार पर मादक पदार्थ की प्रकृति को पहचानना और उस पर आपराधिक अभियोजन चलाना स्वीकार्य साक्ष्य नहीं हो सकता। कोर्ट ने इन मामलों में स्पष्ट रूप से कहा था कि अभियोजन के लिए मादक पदार्थ की फोरेंसिक जांच या किसी विशेषज्ञ की रिपोर्ट आवश्यक है। इन मामलों में भी अभियोजन को यह साबित करने में विफलता मिली कि आरोपित मादक पदार्थ का सेवन कर रहा था, क्योंकि कोई भी वैज्ञानिक परीक्षण या रिपोर्ट उपलब्ध नहीं थी।

वर्तमान मामले में भी ऐसी ही परिस्थिति उत्पन्न हुई थी। अभियोजन पक्ष ने आरोपी पर गांजा से भरी बीड़ी पीने का आरोप लगाया था, लेकिन बीड़ी की कोई फोरेंसिक जांच नहीं की गई थी। यह जांच यह प्रमाणित करने के लिए आवश्यक थी कि बीड़ी में वास्तव में गांजा भरा हुआ था। बिना किसी वैज्ञानिक प्रमाण के, यह दावा कि आरोपी मादक पदार्थ का सेवन कर रहा था, कानूनी रूप से अस्वीकार्य हो जाता है।

KERALA HIGH COURT: धारा 27(b) और धारा 8A के प्रावधान

एनडीपीएस अधिनियम की धारा 27(b) उन अपराधों के लिए सजा का प्रावधान करती है, जो इस अधिनियम की धारा 8A के तहत किए जाते हैं। धारा 8A के तहत, यह अपराध माना जाता है यदि कोई व्यक्ति किसी संपत्ति की वास्तविक प्रकृति, स्रोत, स्थान, निपटान को छिपाता है या उसकी वास्तविकता को बदलता है, जब यह साबित हो कि ऐसी संपत्ति एनडीपीएस अधिनियम या किसी अन्य देश के संबंधित कानून के तहत किए गए अपराध से प्राप्त हुई है।

हालांकि, इस मामले में अभियोजन पक्ष इस बात का कोई ठोस प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सका कि आरोपी ने वास्तव में मादक पदार्थ का सेवन किया था। फोरेंसिक जांच के बिना, यह साबित करना असंभव था कि आरोपी के पास मादक पदार्थ था और उसने इसका उपयोग किया था।

KERALA HIGH COURT: कोर्ट का अंतिम निर्णय

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इस मामले को देखते हुए, केरल हाईकोर्ट ने आरोपी के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष के दावे का कोई ठोस आधार नहीं है क्योंकि बीड़ी की फोरेंसिक जांच नहीं की गई थी। न्यायमूर्ति बेचू कुरियन थॉमस की पीठ ने यह स्पष्ट किया कि बिना किसी वैज्ञानिक प्रमाण के अभियोजन जारी रखना कानून का दुरुपयोग होगा।

हाईकोर्ट ने मलप्पुरम के प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट कोर्ट में लंबित आपराधिक कार्यवाही को भी खारिज कर दिया, जहां यह मामला दर्ज किया गया था। यह निर्णय अभियोजन के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है कि मादक पदार्थों के मामलों में वैज्ञानिक प्रमाण और फोरेंसिक जांच का महत्व अपरिहार्य है।

KERALA HIGH COURT: उपस्थिति

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इस मामले में याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता नवनीत एन. नाथ, गौतम कृष्ण ई.जे., के.एस. स्टीजो और अभिरामी एस. ने पैरवी की, जबकि राज्य की ओर से पब्लिक प्रॉसिक्यूटर नौशाद के.ए. ने पेशी की।

मामला शीर्षक: हमजीथ बनाम केरल राज्य [Crl. MC 2114/2024]

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