SUPREME COURT: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि धारा 29A(4) के तहत समय बढ़ाने के लिए आवेदन, न्यायाधिकरण के कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी किया जा सकता है, बशर्ते ‘पर्याप्त कारण’ प्रस्तुत किया जाए। इसका उद्देश्य विवाद समाधान की प्रक्रिया को प्रभावी और तार्किक रूप से पूरा करना है। इस फैसले में कोर्ट ने यह तय किया कि यदि समयसीमा समाप्त हो जाती है तो भी संबंधित पक्षों को आवेदन करने का अधिकार मिलेगा।
यह निर्णय M/S Ajay Protech Pvt. Ltd. v. General Manager & Anr. मामले में दिया गया। अपीलकर्ता ने उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसमें कहा गया था कि समय विस्तार का आवेदन न्यायाधिकरण के कार्यकाल के समाप्त होने के बाद भी स्वीकार किया जा सकता है।
SUPREME COURT: मामले की पृष्ठभूमि और कोर्ट की टिप्पणी
मामले के अनुसार, अपीलकर्ता और प्रतिवादी के बीच एक वर्क्स कॉन्ट्रैक्ट विवाद उत्पन्न हुआ था, जिसके बाद दोनों पक्षों ने मामले का समाधान करने के लिए मध्यस्थता (Arbitration) का रास्ता अपनाया था। प्रारंभिक चरण में, अपीलकर्ता ने धारा 11 के तहत एक एकल न्यायाधिकरण नियुक्त करने का आवेदन किया, जिसे उच्च न्यायालय ने स्वीकार किया।
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फिर इसके बाद, 12 महीने की वैधानिक अवधि, जो धारा 29A(1) के तहत निर्धारित थी, अक्टूबर 2020 में समाप्त होनी थी। हालांकि कोविड-19 महामारी के कारण, इस समय को 2 वर्षों तक स्थगित किया गया।
फिर 2023 में, न्यायाधिकरण की सुनवाई पूरी हो गई, और अपीलकर्ता ने समय सीमा बढ़ाने के लिए धारा 29A(4) के तहत गुजरात उच्च न्यायालय में आवेदन दायर किया। हालांकि, उच्च न्यायालय ने इसे खारिज कर दिया, और अपीलकर्ता ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति पामिदीघंटम श्री नरसिम्हा और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने अपने आदेश में कहा, “यह अदालत का अधिकार है कि वह न्यायिक हस्तक्षेप करे और यदि आवश्यक हो तो किसी भी मामले में विवाद समाधान की प्रक्रिया को उसके तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाने के लिए कदम उठाए।”
SUPREME COURT: कोविड-19 महामारी का प्रभाव और समय विस्तार का महत्व
अपीलकर्ता ने याचिका में कहा कि कोविड-19 महामारी के कारण समयसीमा में देरी हुई और इस वजह से समय विस्तार का आवेदन उचित था। कोर्ट ने इस दृष्टिकोण को स्वीकार किया और कहा कि ‘पर्याप्त कारण’ की व्याख्या विवाद समाधान की प्रक्रिया को सहायक बनाने के संदर्भ में की जानी चाहिए, ताकि समयसीमा को बढ़ाने के लिए अच्छे कारणों को माना जाए।
कोर्ट ने इस बात को भी रेखांकित किया कि ‘पर्याप्त कारण’ का मतलब सिर्फ तात्कालिक कारण नहीं है, बल्कि इसे विवाद समाधान की प्रक्रिया को सुचारू और प्रभावी तरीके से चलाने के संदर्भ में समझना चाहिए। विशेष रूप से, महामारी के दौरान अदालत ने उन समयावधियों को भी ध्यान में रखा, जब सामान्य प्रक्रिया स्थगित रही थी।
सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालय के फैसले को खारिज करते हुए अपील स्वीकार की और न्यायाधिकरण द्वारा पुरस्कार (award) देने की समयसीमा को बढ़ाकर 31 दिसंबर, 2024 तक कर दिया। कोर्ट ने यह भी कहा कि धारा 29A(4) के तहत समय बढ़ाने के लिए आवेदन समाप्ति के बाद भी किया जा सकता है, और यह प्रक्रिया कोर्ट द्वारा ‘पर्याप्त कारण’ दिखाए जाने पर की जा सकती है।
कोर्ट ने इस आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि जहां तक समय विस्तार का सवाल है, उसे विवाद समाधान की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने और समाधान को शीघ्रता से प्राप्त करने के उद्देश्य से किया जाता है।
SUPREME COURT: न्यायिक संदर्भ और आदेश की महत्वपूर्ण बातें
सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश धारा 29A के तहत समय बढ़ाने के आवेदन को लेकर एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे यह स्पष्ट हो गया है कि न्यायालय विवाद समाधान की प्रक्रिया में किसी भी तरह की अड़चनों को दूर करने के लिए हस्तक्षेप कर सकता है, बशर्ते आवेदन में ‘पर्याप्त कारण’ प्रस्तुत किया जाए।
इसके साथ ही यह भी साफ हो गया है कि कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी समय बढ़ाने का आवेदन किया जा सकता है, जो पार्टी की स्वायत्तता और विवाद समाधान के उद्देश्य के अनुरूप है।
मामला: M/S Ajay Protech Pvt. Ltd. v. General Manager & Anr
न्यायिक संदर्भ: 2024 INSC 889
प्रस्तुति: अपीलकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव अग्रवाल, AOR C. George Thomas, अधिवक्ता मानन डागा, कर्निया लक्ष्मी और प्रतिवादी की ओर से AOR अमरीश कुमार
Regards:- Adv.Radha Rani for LADY MEMBER EXECUTIVE in forthcoming election of Rohini Court Delhi✌🏻





