Delhi cm Rekha gupta scheme

सुप्रीम कोर्ट ने PUSH-BACK POLICY पर सुनवाई से किया इनकार, याचिकाकर्ता को हाईकोर्ट जाने की सलाह 2025 !

सुप्रीम कोर्ट ने PUSH-BACK POLICY पर सुनवाई से किया इनकार, याचिकाकर्ता को हाईकोर्ट जाने की सलाह 2025 !

PUSH-BACK POLICY: दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट ने असम सरकार की उस नीति के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया, जिसमें कथित

Table of Contents

PUSH-BACK POLICY: दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट ने असम सरकार की उस नीति के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया, जिसमें कथित तौर पर विदेशी नागरिकों को बिना उचित प्रक्रिया अपनाए हिरासत में लिया जा रहा है और वापस भेजा जा रहा है।

PUSH-BACK POLICY
PUSH-BACK POLICY

इस नीति को ‘पुश-बैक नीति’ कहा जा रहा है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता से कहा कि इस मामले को पहले गुवाहाटी हाई कोर्ट में उठाएं।

यह याचिका ऑल बीटीसी माइनॉरिटी स्टूडेंट्स यूनियन नामक संगठन की ओर से दायर की गई थी। संगठन की ओर से वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े ने सुप्रीम कोर्ट में पैरवी की। सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस संजय करोल और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने साफ कहा कि पहले इस मामले को हाई कोर्ट में उठाना जरूरी है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश की आड़ में बड़ी कार्रवाई का आरोप

PUSH-BACK POLICY: याचिका में आरोप लगाया गया है कि असम सरकार ने ऐसे लोगों को विदेशी मानकर हिरासत में लेना और डिपोर्ट करना शुरू कर दिया है, जिनकी नागरिकता की पुष्टि अभी नहीं हुई है। इसमें कहा गया कि ये कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट के 4 फरवरी 2025 के एक आदेश के नाम पर की जा रही है, जिसमें 63 विदेशी घोषित लोगों को दो हफ्ते के भीतर देश से बाहर भेजने को कहा गया था। लेकिन याचिकाकर्ता का कहना है कि इस आदेश की आड़ में सरकार ने एक बड़ा अभियान शुरू कर दिया है, जिसमें ऐसे लोगों को भी पकड़ा जा रहा है जिनके पास भारतीय दस्तावेज हैं और जिनका मामला अभी अदालतों में लंबित है।

NEET-PG 2025 एक ही शिफ्ट में होगा सुप्रीम कोर्ट ने NBE को दिए निर्देश

रिज क्षेत्र में अवैध कटाई: दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने DDA अधिकारियों को ठहराया दोषी 2025 !

याचिका में क्या कहा गया?

याचिका अधिवक्ता अदील अहमद के माध्यम से दायर की गई थी। इसमें बताया गया कि असम पुलिस और प्रशासन ने बिना फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल (विदेशी न्यायाधिकरण) के आदेश और बिना नागरिकता की पुष्टि के कई लोगों को हिरासत में लिया और वापस बांग्लादेश भेज दिया। इनमें एक सेवानिवृत्त शिक्षक का उदाहरण भी दिया गया, जिन्हें कथित रूप से बांग्लादेश डिपोर्ट कर दिया गया जबकि उनके पास भारतीय नागरिकता के कागज़ थे।

याचिका में दावा किया गया है कि यह कार्रवाई संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार), और अनुच्छेद 22 (गिरफ्तारी से जुड़े अधिकारों) का उल्लंघन है। इसके अलावा यह भी कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट के उस पुराने फैसले का भी उल्लंघन किया गया है जिसमें कहा गया था कि किसी भी व्यक्ति को तब तक डिपोर्ट नहीं किया जा सकता जब तक उसे सभी कानूनी विकल्प जैसे अपील, समीक्षा आदि का पूरा अवसर न दिया जाए।

headlines live news Facebook Feed 2024

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुनवाई के दौरान जब याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि याचिका सुप्रीम कोर्ट के आदेश के आधार पर दाखिल की गई है, तो बेंच ने कहा कि पहले इस मामले को गुवाहाटी हाईकोर्ट में ले जाएं। इसके बाद याचिकाकर्ता ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार कर लिया।

रोहिणी कोर्ट मे शूरवीर महाराणा प्रताप व पृथ्वीराज चौहान की जयंती | Bolega India

भारतीय दस्तावेज रखने वालों को भी माना जा रहा विदेशी

इस नीति के तहत, असम सरकार कथित तौर पर उन लोगों को बिना पूरी कानूनी प्रक्रिया के देश से बाहर भेज रही है जिन्हें वह अवैध प्रवासी मानती है। लेकिन याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इस नीति के तहत कई ऐसे लोग भी प्रभावित हो रहे हैं जिनके पास भारतीय नागरिकता के पक्के दस्तावेज हैं और उनका नाम वोटर लिस्ट में दर्ज है।

PUSH-BACK POLICY

याचिका में फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल की अनदेखी का आरोप

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस तरह के मामलों की पहले राज्य हाई कोर्ट में सुनवाई होनी चाहिए। इस पूरे घटनाक्रम से यह सवाल खड़ा होता है कि क्या सरकार नागरिकता की पुष्टि किए बिना किसी को विदेशी घोषित कर सकती है और बिना फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के आदेश के डिपोर्ट कर सकती है?

यह मामला अब गुवाहाटी हाई कोर्ट में उठाया जाएगा, जहाँ यह तय होगा कि क्या असम सरकार की यह कार्रवाई कानून और संविधान के दायरे में है या नहीं।

Facebook
WhatsApp
Twitter
Threads
Telegram

संबंधित खबरें

Leave a comment