राजस्थान हाईकोर्ट द्वारा बीएनएसएस की धारा 95 के संदर्भ में डाक प्राधिकरण को टेलीकॉम प्राधिकरण के रूप में पढ़ने के आदेश के बारे में निम्नलिखित विस्तृत खबर है। इस खबर में हम जानेंगे कि अदालत ने क्यों और कैसे यह निर्णय लिया कि आधुनिक समय में डाक प्राधिकरण का अर्थ टेलीकॉम प्राधिकरण भी होना चाहिए। इस मामले में याचिकाकर्ता की ओर से कौन से तर्क दिए गए और अदालत का अंतिम निर्णय क्या रहा।
राजस्थान हाईकोर्ट: मामले का परिचय
राजस्थान हाईकोर्ट ने बीएनएसएस (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता), 2023 की धारा 95 के संदर्भ में एक ऐतिहासिक आदेश जारी किया है, जिसमें यह टिप्पणी की गई है कि डाक प्राधिकरण का अर्थ अब टेलीकॉम प्राधिकरण के रूप में भी पढ़ा जा सकता है। इस संदर्भ में न्यायालय ने कहा कि आधुनिक संदर्भ में, डाक प्राधिकरण को टेलीकॉम प्राधिकरण या सेवा प्रदाता के रूप में भी समझा जाना चाहिए, क्योंकि ये इलेक्ट्रॉनिक डेटा को संरक्षित करते हैं और उपभोक्ताओं को उनकी सेवाएं उपलब्ध कराते हैं।
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मामले में याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता सिद्धार्थ करवासरा ने पैरवी की। याचिकाकर्ता ने बीएनएसएस की धारा 94 के तहत एक आवेदन दायर किया था, जिसमें गवाहों के कॉल विवरण और उनके स्थान की जानकारी को सबूत के उचित चरण में प्रस्तुत करने का अनुरोध किया गया था। हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने इस याचिका को खारिज कर दिया था। याचिकाकर्ता का कहना था कि ट्रायल कोर्ट ने इस आवेदन को गलत तरीके से खारिज कर दिया और बीएनएसएस की धारा 94 का गलत अर्थ लगाया गया है।
राजस्थान हाईकोर्ट: अदालत का विश्लेषण
राजस्थान हाईकोर्ट ने इस मामले का गहन विश्लेषण किया और पाया कि बीएनएसएस की धारा 94 का उपयोग केवल अदालत या पुलिस थाने के प्रभारी अधिकारी द्वारा ही किया जा सकता है। न्यायमूर्ति अरुण मोंगा की एकल पीठ ने कहा कि यह प्रावधान अदालत के लाभ के लिए प्रासंगिक दस्तावेजों को प्रस्तुत करने के लिए बनाया गया है, ताकि अपराध से जुड़े साक्ष्य को सही समय पर प्रस्तुत किया जा सके।
हालांकि, यह बात भी कही गई कि आरोपी इस प्रावधान का उपयोग नहीं कर सकता है, और इसी कारण से ट्रायल कोर्ट ने आवेदन खारिज करने में कोई कानूनी त्रुटि नहीं की थी। इसके बावजूद, “न्याय के हितों की रक्षा” के लिए अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता एक गंभीर अपराध, यानी हत्या के आरोप में विचाराधीन है। इस मामले में उसे दोषी ठहराए जाने पर मृत्युदंड या आजीवन कारावास की सजा मिल सकती है।
राजस्थान हाईकोर्ट: बीएनएसएस की धारा 95 का उपयोग
अदालत ने बीएनएसएस की धारा 95 के संदर्भ में कहा कि इस प्रावधान के तहत अदालतें सेवा प्रदाताओं को आवश्यक रिकॉर्ड प्रस्तुत करने और संरक्षित रखने का आदेश दे सकती हैं, ताकि सबूत समय पर उपलब्ध हो सकें। इस प्रकार की व्यवस्था अदालत को अभियोजन और रक्षा दोनों पक्षों के हित में न्यायसंगत तरीके से काम करने में सक्षम बनाती है। अदालत ने कहा कि “प्रक्रियात्मक नियम न्याय की सुविधा के लिए बनाए गए हैं, न कि उसे बाधित करने के लिए।”
अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि “अगर प्रक्रियात्मक नियमों का कड़ा पालन साक्ष्य के नष्ट होने का कारण बनता है और आरोपी को अपना बचाव करने का उचित अवसर नहीं मिलता, तो अदालत को मानक से भटकने के लिए अपना विवेक प्रयोग करना चाहिए।” यह बयान न्याय की गहन समझ को दर्शाता है, जिसमें अभियोजन और रक्षा दोनों पक्षों को समान अवसर देने की बात कही गई है।
इसी संदर्भ में, अदालत ने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को संरक्षित करने की अनुमति देना जरूरी है, ताकि वे नष्ट न हों और न्यायिक प्रक्रिया की अखंडता बनी रहे। अदालत ने स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अर्थ है आपराधिक अभियोजन में स्वयं की रक्षा का अधिकार। अगर किसी आरोपी को महत्वपूर्ण साक्ष्य प्रस्तुत करने से रोका जाता है, जैसे कि कॉल विवरण और स्थान संबंधी रिकॉर्ड, तो यह उसके मौलिक अधिकार का उल्लंघन होगा।
राजस्थान हाईकोर्ट: अदालतों का कर्तव्य
“अदालतों का कर्तव्य है कि वे न्याय का हनन न होने दें।” यह कथन अदालतों के उच्चतम दायित्व को रेखांकित करता है। अदालत ने कहा कि प्रक्रियात्मक देरी के कारण महत्वपूर्ण साक्ष्य खोना भी एक अनुचित ट्रायल का परिणाम हो सकता है, जो गलत दोषसिद्धि या सख्त सजा का कारण बन सकता है। इस मामले में, अगर आरोपी की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण साक्ष्य (जो तीसरे पक्ष के पास है) को सुरक्षित नहीं किया गया, तो इससे अभियोजन पक्ष के पक्ष में असंतुलन उत्पन्न हो सकता है, जो कि खत्म किया जाना चाहिए।
इन सभी तथ्यों और तर्कों के आधार पर, उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता की याचिका को स्वीकार कर लिया और ट्रायल कोर्ट के आदेश को संशोधित करने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि बीएनएसएस की धारा 95 का उपयोग करते हुए ट्रायल कोर्ट को सेवा प्रदाताओं से आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत करने का निर्देश देना चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि आवश्यक साक्ष्य समय पर अदालत में उपलब्ध हों और आरोपी को अपने बचाव का उचित मौका मिल सके।
राजस्थान हाईकोर्ट: मामले का निष्कर्ष
इस मामले में अदालत ने एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया कि डाक प्राधिकरण का अर्थ आधुनिक समय में टेलीकॉम प्राधिकरण के रूप में भी समझा जाए। यह निर्णय न केवल न्याय प्रक्रिया को मजबूत बनाता है बल्कि यह सुनिश्चित करता है कि अभियोजन और रक्षा दोनों पक्षों को समान अवसर मिले।
इस निर्णय से यह संदेश भी जाता है कि अदालतें प्रक्रियात्मक न्याय के मूल सिद्धांतों का पालन करने के लिए प्रतिबद्ध हैं और किसी भी प्रकार के अन्याय से बचने के लिए उचित उपाय अपनाने के लिए तैयार हैं।








