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क्या न्याय बिका? कोर्ट स्टाफ पर रिश्वतखोरी के आरोपों से मचा हड़कंप 2025 !

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क्या न्याय बिका? दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट से एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसने देश की न्यायिक प्रणाली और भ्रष्टाचार के खिलाफ

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क्या न्याय बिका? दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट से एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसने देश की न्यायिक प्रणाली और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई पर गहरा सवाल खड़ा कर दिया है।

क्या न्याय बिका? कोर्ट स्टाफ पर रिश्वतखोरी के आरोपों से मचा हड़कंप 2025 !
क्या न्याय बिका? कोर्ट स्टाफ पर रिश्वतखोरी के आरोपों से मचा हड़कंप 2025 !

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) से जुड़े एक मामले की सुनवाई कर रही स्पेशल जज दीपावली शर्मा का अचानक तबादला कर दिया गया। इसके साथ ही उनके कोर्ट के रिकॉर्ड कीपर (अहलमद) मुकेश कुमार पर जमानत के बदले रिश्वत मांगने का गंभीर आरोप लगा। यह घटनाक्रम न केवल चौंकाने वाला है, बल्कि न्यायपालिका की निष्पक्षता और ईमानदारी पर भी कई सवाल खड़े करता है।

अचानक तबादला और गंभीर आरोप

स्पेशल जज दीपावली शर्मा का तबादला ऐसे समय में हुआ जब उनके कोर्ट में भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की सुनवाई चल रही थी। इस बीच एंटी करप्शन ब्रांच (ACB) ने कोर्ट के अहलमद मुकेश कुमार के खिलाफ रिश्वतखोरी का मामला दर्ज कर लिया। ACB का आरोप है कि मुकेश ने जमानत दिलवाने के लिए मोटी रकम की मांग की। एक शिकायत में कहा गया कि 30 दिसंबर 2024 को एक GST अधिकारी के रिश्तेदार ने ACB को ईमेल भेजकर आरोप लगाया कि कोर्ट के अधिकारी 85 लाख रुपये और अन्य आरोपियों के लिए 1 करोड़ रुपये की रिश्वत मांग रहे हैं।

इसके अलावा एक और शिकायत में कहा गया कि जनवरी 2025 में तीन आरोपियों की जमानत के लिए मुकेश कुमार ने प्रति व्यक्ति 15-20 लाख रुपये की मांग की थी। इस आधार पर ACB ने विशाल कुमार नामक एक आरोपी को गिरफ्तार किया, जिसने कथित तौर पर खुलासा किया कि उसने मुकेश को 40 लाख रुपये की रिश्वत देकर अंतरिम और नियमित जमानत हासिल की थी। विशाल ने यह भी बताया कि वह अन्य आरोपियों, जैसे राज सिंह सैनी (85 लाख रुपये), ललित कुमार (15 लाख रुपये) आदि के लिए मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा था।

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साजिश का दावा और CBI जांच की मांग

मुकेश कुमार ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है और इसे अपने व स्पेशल जज दीपावली शर्मा के खिलाफ “साजिश” करार दिया है। उन्होंने दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर कर मामले की सीबीआई जांच की मांग की है। मुकेश का कहना है कि उन्हें फंसाया जा रहा है और सच्चाई सामने लाने के लिए निष्पक्ष जांच आवश्यक है।

22 मई को राउज एवेन्यू कोर्ट ने मुकेश की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी, जिसमें कोर्ट ने कहा कि उनकी हिरासत में पूछताछ जरूरी है ताकि रिश्वत की रकम और अन्य सह-आरोपियों की भूमिका का खुलासा हो सके।

क्या न्याय बिका?

ACB अधिकारियों पर भी आरोप

इस पूरे घटनाक्रम में एक और सनसनीखेज मोड़ तब आया जब अतिरिक्त लोक अभियोजक (ADDL PP) मनोज कुमार गर्ग ने 11 फरवरी 2025 को स्पेशल जज को एक पत्र लिखा। पत्र में उन्होंने खुलासा किया कि ACB के एक अधिकारी ने उनसे कहा था कि वे कोर्ट के जज और स्टाफ के खिलाफ कार्रवाई करने की योजना बना रहे हैं। इसका कारण यह बताया गया कि कोर्ट ने ACB की जांच पर सख्त टिप्पणियां की थीं, जिससे ACB के अधिकारी नाराज हो गए थे। गर्ग को यह चेतावनी भी दी गई कि यदि वे जांच में खामियां निकालते हैं, तो उन्हें भी परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।

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हाई कोर्ट का हस्तक्षेप और जज के खिलाफ सबूतों की कमी

यह पूरा मामला अप्रैल 2023 में दर्ज हुए एक GST घोटाले से जुड़ा है, जिसमें एक अधिकारी पर फर्जी कंपनियों को 2021 में गलत तरीके से GST रिफंड देने का आरोप है। इस मामले में 16 आरोपी गिरफ्तार हुए थे। जब इन आरोपियों ने जमानत याचिकाएं दाखिल कीं, तो ACB का दावा है कि उस समय जमानत के बदले रिश्वत का खेल शुरू हुआ।

ACB ने 29 जनवरी को दिल्ली सरकार के कानून विभाग के प्रमुख सचिव को एक पत्र लिखकर स्पेशल जज और मुकेश कुमार के खिलाफ जांच की अनुमति मांगी। हालांकि, दिल्ली हाई कोर्ट ने 14 फरवरी को यह अनुमति देने से इनकार कर दिया क्योंकि ACB के पास जज के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं था।

क्या न्याय बिका?

न्यायिक व्यवस्था पर सवाल

मुकेश कुमार की याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट ने दिल्ली सरकार से 29 मई तक जवाब दाखिल करने को कहा है। इस बीच यह मामला न्यायपालिका की निष्पक्षता और विश्वसनीयता को लेकर व्यापक बहस को जन्म दे रहा है। क्या यह सच में रिश्वतखोरी का मामला है, या किसी ईमानदार जज और उनके स्टाफ को निशाना बनाने की साजिश? अभी इस पर कोई अंतिम राय नहीं दी जा सकती, लेकिन एक बात साफ है कि यह घटनाक्रम न्यायिक व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही की जरूरत को दर्शाता है।

इस पूरे विवाद ने यह भी दिखाया है कि कैसे सत्ता या जांच एजेंसियां न्यायपालिका पर दबाव डाल सकती हैं, और यदि ऐसा होता है तो यह लोकतंत्र की बुनियाद के लिए गंभीर खतरा है। यह भी स्पष्ट है कि ऐसे मामलों में निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच ही न्याय का एकमात्र रास्ता है।

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