MADHYA PRADESH HIGH COURT: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा कि भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 125 के तहत भरण-पोषण (मेंटेनेंस) के प्रावधानों का उद्देश्य ऐसा वर्ग तैयार करना नहीं है जो जीवनसाथी की आय पर आश्रित होकर निष्क्रिय जीवन जीए। कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि भरण-पोषण के प्रावधान केवल जरूरतमंद और वंचित लोगों की मदद के लिए हैं, न कि सक्षम और योग्य लोगों के लिए, जो स्वयं अपना जीवनयापन कर सकते हैं।
यह मामला उस याचिकाकर्ता द्वारा दायर पुनरीक्षण याचिका से जुड़ा था, जिसमें उसने निचली अदालत के आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे उसकी पत्नी और बेटी को भरण-पोषण देने का आदेश दिया गया था। याचिकाकर्ता का दावा था कि उसकी पत्नी एम.कॉम की डिग्री धारक है, जिसने पहले फिल्म उद्योग में काम किया था और वर्तमान में वह एक डांस क्लास चला रही है। इस आधार पर याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि उसकी पत्नी भरण-पोषण की हकदार नहीं है, क्योंकि वह स्वयं अपनी आजीविका कमा सकती है।
MADHYA PRADESH HIGH COURT: भरण-पोषण का उद्देश्य और निष्क्रियता का मुद्दा
न्यायमूर्ति प्रेम नारायण सिंह की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिकाकर्ता के तर्कों को सुनने के बाद कहा कि धारा 125 सीआरपीसी का उद्देश्य यह नहीं है कि वह लोगों को निष्क्रिय या आलसी बनाकर उनके जीवनसाथी की आय पर निर्भर रहने की स्थिति में छोड़ दे। कोर्ट ने जोर देते हुए कहा, “यह प्रावधान उन व्यक्तियों के लिए नहीं है जो अपने जीवनसाथी की आय पर निर्भर रहना चाहते हैं और अपनी क्षमताओं का उपयोग नहीं करते। कानून का उद्देश्य सक्षम व्यक्तियों को स्वावलंबी बनाना है, न कि उन्हें केवल भरण-पोषण की आशा में छोड़ देना।”
madhya pradesh high court: एसडीओ का बिना कारण वाला आदेश रद्द किया
कोर्ट ने कहा कि केवल शैक्षिक योग्यता के आधार पर किसी महिला को भरण-पोषण के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता, लेकिन अगर वह रोजगार पाने में सक्षम है, तो यह भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा, “यह एक स्थापित तथ्य है कि प्रतिवादी (पत्नी) एक उच्च शिक्षित महिला है और अपने कौशल और योग्यता के आधार पर वह आय अर्जित कर सकती है। हालांकि, पति द्वारा आर्थिक सहायता प्रदान की जा रही है, फिर भी वह अपनी आजीविका के लिए कुछ आय कमा सकती है।”
MADHYA PRADESH HIGH COURT: पत्नी की योग्यता और वर्तमान रोजगार
याचिकाकर्ता के वकील सुधा श्रीवास्तव ने यह तर्क दिया कि उनकी मुवक्किल की पत्नी ने पहले भी काम किया है और वर्तमान में भी एक डांस क्लास चला रही है, जिससे यह साबित होता है कि वह आत्मनिर्भर हो सकती है। हालांकि, प्रतिवादी (पत्नी) की ओर से वकील अर्पित सिंह ने यह तर्क दिया कि भले ही पत्नी के पास शैक्षिक योग्यता हो, लेकिन उसे अपने और अपने बच्चे के भरण-पोषण के लिए पति की सहायता की आवश्यकता है, क्योंकि उसकी वर्तमान आय पर्याप्त नहीं है।
कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों को ध्यान में रखते हुए पाया कि भले ही पत्नी के पास रोजगार के कुछ साधन हो सकते हैं, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है कि वह अपने और अपनी बेटी की पूरी तरह से देखभाल कर सके। कोर्ट ने इस तथ्य पर भी जोर दिया कि केवल किसी महिला की शैक्षिक योग्यता के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि वह आत्मनिर्भर है और उसे भरण-पोषण की आवश्यकता नहीं है।
MADHYA PRADESH HIGH COURT: भरण-पोषण की राशि में संशोधन: पति की वित्तीय स्थिति का आकलन
कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता की वित्तीय स्थिति को ध्यान में रखते हुए, जो एचडीएफसी बैंक में वरिष्ठ प्रबंधक के पद पर कार्यरत है, वह अपनी पत्नी और बेटी के भरण-पोषण के लिए पर्याप्त रूप से सक्षम है। हालांकि, कोर्ट ने पाया कि ₹25,000 प्रति माह की भरण-पोषण राशि अत्यधिक थी और इसे घटाकर ₹20,000 प्रति माह कर दिया, क्योंकि पत्नी भी कुछ हद तक आय अर्जित कर सकती है। इसके साथ ही, कोर्ट ने दंपति की बेटी के लिए ₹15,000 प्रति माह की भरण-पोषण राशि को बरकरार रखा जब तक कि वह वयस्क नहीं हो जाती।
याचिकाकर्ता ने यह तर्क दिया कि भरण-पोषण का आदेश उस पर एक अत्यधिक वित्तीय बोझ डाल रहा है, क्योंकि वह अपने पिता और भाई का भी समर्थन कर रहा है। लेकिन कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया और कहा कि याचिकाकर्ता की वित्तीय स्थिति इतनी मजबूत है कि वह अपने परिवार की देखभाल कर सके। जिरह के दौरान, याचिकाकर्ता ने स्वीकार किया कि उसके पास मुंबई में एक घर और एक बड़ा सावधि जमा है, जो उसकी वित्तीय स्थिरता को साबित करता है।
MADHYA PRADESH HIGH COURT: भरण-पोषण का कानूनी आधार और कोर्ट का दृष्टिकोण
कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि भरण-पोषण का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी व्यक्ति, विशेष रूप से महिलाएं, आर्थिक रूप से असहाय न रहें। हालांकि, यह भी जरूरी है कि यह सुनिश्चित किया जाए कि भरण-पोषण के प्रावधानों का दुरुपयोग न हो और इसे सिर्फ वित्तीय सहायता पाने का एक जरिया न बना लिया जाए।
कोर्ट ने कहा, “धारा 125 का मुख्य उद्देश्य जरूरतमंदों की मदद करना है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि योग्य और सक्षम लोग, जो रोजगार पा सकते हैं, केवल भरण-पोषण की आशा में निष्क्रिय बने रहें। कानून का उद्देश्य यह है कि सभी लोग अपनी पूरी क्षमता के साथ समाज में योगदान करें और आत्मनिर्भर बनें।”
इस मामले में, कोर्ट ने पत्नी की शैक्षिक योग्यता और रोजगार क्षमता को ध्यान में रखते हुए भरण-पोषण की राशि को घटाया, लेकिन उसे पूरी तरह से भरण-पोषण से वंचित नहीं किया। कोर्ट ने यह भी माना कि पति की वित्तीय स्थिति इतनी मजबूत है कि वह अपनी पत्नी और बेटी की देखभाल कर सके, साथ ही अपने अन्य पारिवारिक जिम्मेदारियों का भी निर्वाह कर सके।
MADHYA PRADESH HIGH COURT: भरण-पोषण की आवश्यकता और आत्मनिर्भरता
इस फैसले में कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भरण-पोषण का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि महिलाएं और बच्चे आर्थिक रूप से सुरक्षित रहें, लेकिन इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि सक्षम व्यक्ति आत्मनिर्भर बनें। इस मामले में, कोर्ट ने याचिकाकर्ता की वित्तीय स्थिति और पत्नी की रोजगार क्षमता दोनों का संतुलित दृष्टिकोण से आकलन किया, जिससे एक निष्पक्ष निर्णय लिया जा सके।
इस प्रकार, यह मामला स्पष्ट करता है कि भरण-पोषण का अधिकार जरूरी है, लेकिन इसे जिम्मेदारी और आत्मनिर्भरता के सिद्धांतों के साथ संतुलित किया जाना चाहिए।









