विधानसभा चुनाव 1998: 1998 का दिल्ली विधानसभा चुनाव भारतीय राजनीति में एक अहम मोड़ साबित हुआ।
इस चुनाव में प्याज की महंगाई ने ऐसी भूचाल मचाई कि उसने बीजेपी को सत्ता से बाहर कर दिया और दिल्ली की सत्ता पर काबिज कांग्रेस के लिए रास्ता खोल दिया। उस वक्त दिल्ली में बीजेपी की सरकार थी, और पार्टी ने सुषमा स्वराज को मुख्यमंत्री के रूप में पेश किया था, लेकिन प्याज की कीमतों ने उसे इस चुनाव में बुरी तरह झकझोर दिया। इस चुनाव के बाद दिल्ली में शीला दीक्षित का राज स्थापित हुआ, जो लगभग 15 वर्षों तक चला।
विधानसभा चुनाव 1998: प्याज की महंगाई और जमाखोरी
1998 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले प्याज की कीमतें आसमान छूने लगी थीं। आमतौर पर 4-5 रुपये किलो बिकने वाला प्याज अचानक 50 रुपये किलो तक पहुंच गया। इसका फायदा उठाते हुए व्यापारियों ने प्याज की जमाखोरी शुरू कर दी, जिससे कीमतें और भी बढ़ गईं। दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों में लोगों के बीच प्याज के लिए मारामारी मच गई थी। यह स्थिति और भी बिगड़ गई, जब अफवाहें फैलने लगीं कि नमक भी प्याज की तरह महंगा होने वाला है। नतीजतन, लोग नमक के भंडारण के लिए दुकानों पर उमड़ने लगे, और घर-घर में यह चर्चा थी कि कहीं नमक भी महंगा न हो जाए।
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भोजपुरी गीत के जरिए महंगाई पर कटाक्ष
उस समय भोजपुरी के एक गायक मनोज तिवारी ‘मृदुल’ ने प्याज की महंगाई पर एक गाना गाया, जो उन दिनों दिल्ली और उत्तर भारत में बहुत ही लोकप्रिय हो गया। गाने के बोल थे, “अब का सलाद खईब, पियजिया अनार हो गईल। वाह रे अटल चाचा, निमकिया पे मार हो गईल…” इस गाने में उन्होंने प्याज की महंगाई और नमक की किल्लत पर तंज कसा। गाने ने उन दिनों की सच्चाई को हंसी मजाक के रूप में जनता के सामने रखा, और राजनीतिक माहौल को बहुत ही प्रभावी तरीके से चित्रित किया।
बीजेपी का कुप्रबंधन और सुषमा स्वराज की असफलता
बीजेपी ने उस समय सुषमा स्वराज को मुख्यमंत्री उम्मीदवार के रूप में पेश किया था। हालांकि सुषमा स्वराज ने प्याज की महंगाई को नियंत्रित करने की पूरी कोशिश की, लेकिन जमाखोरी और अनियंत्रित बाजार के कारण वह सफल नहीं हो पाईं। इसके अलावा, चुनाव से पहले दिल्ली में तीन-तीन मुख्यमंत्री बदलने के बाद बीजेपी की स्थिति पहले से ही कमजोर हो चुकी थी। बीजेपी का मानना था कि सुषमा स्वराज के नेतृत्व में प्याज की महंगाई को काबू कर लिया जाएगा और पार्टी को फायदा होगा, लेकिन यह रणनीति पूरी तरह से विफल रही।
चुनाव की घोषणा और शीला दीक्षित का चेहरा
बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने महिला नेताओं को चेहरा बनाकर चुनावी मैदान में उतारा था। बीजेपी ने सुषमा स्वराज को और कांग्रेस ने शीला दीक्षित को अपना मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित किया था। शीला दीक्षित तब दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमिटी की प्रमुख थीं, और उन्होंने 1993 के चुनाव में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। हालांकि 1996 के लोकसभा चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा था, लेकिन 1998 में दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले उनकी राजनीतिक छवि को सुधारने का अवसर मिला था।
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1998 के चुनाव परिणाम और कांग्रस की ऐतिहासिक जीत
25 नवंबर 1998 को चुनाव हुए, और तीन दिन बाद 28 नवंबर को चुनावी नतीजे घोषित किए गए। प्याज की महंगाई ने चुनावी परिणामों को प्रभावित किया। जहां 1993 में 49 सीटों पर जीत हासिल करने वाली बीजेपी 15 सीटों पर सिमट गई, वहीं कांग्रेस ने 52 सीटों पर विजय प्राप्त की। यह चुनाव परिणाम बीजेपी के लिए एक बड़ा झटका था। सुषमा स्वराज, जो महज 52 दिन ही मुख्यमंत्री रह पाई, को इस महंगाई के कारण सत्ता से बाहर होना पड़ा। दिल्ली में शीला दीक्षित के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार का गठन हुआ, जो अगले 15 वर्षों तक कायम रही।
प्याज की महंगाई और राजनीतिक बदलाव
प्याज की महंगाई ने 1998 के चुनाव में बीजेपी को सत्ता से बाहर कर दिया और कांग्रेस के लिए रास्ता खोला। इस महंगाई ने चुनावी माहौल को पूरी तरह से बदल दिया। वह समय था जब प्याज की कीमत ने दिल्ली की राजनीति को इस हद तक प्रभावित किया कि एक पूरी सरकार को उखाड़ फेंका और एक नई राजनीतिक ताकत को जन्म दिया। बीजेपी की दिल्ली में सत्ता में वापसी की राह बहुत कठिन हो गई और इस चुनाव के बाद बीजेपी दिल्ली की सत्ता में आने के लिए तरसती रही।
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सुषमा स्वराज का मुख्यमंत्री बनने का सपना और शीला दीक्षित का नेतृत्व
सुषमा स्वराज की मुख्यमंत्री बनने की उम्मीदें पूरी नहीं हो पाई। चुनावी परिणाम के बाद बीजेपी दफ्तर में सन्नाटा था, जबकि कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच खुशी का माहौल था। कांग्रेसी कार्यकर्ता ढोल-नगाड़ों के साथ जश्न मना रहे थे। अगले दिन के अखबारों में प्याज की माला के साथ कांग्रेस के जश्न की तस्वीरें छपी थीं। इस चुनाव ने दिल्ली में शीला दीक्षित का राजनीतिक युग शुरू किया, जो दिल्ली की राजनीति में एक स्थिरता और विकास की दिशा में बड़ा कदम साबित हुआ।
चुनावी रणनीतियों और नेताओं की छवि का महत्व
1998 का दिल्ली विधानसभा चुनाव भारतीय राजनीति के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। प्याज की महंगाई ने बीजेपी को सत्ता से बाहर कर दिया और कांग्रेस के लिए दिल्ली की सत्ता पर काबिज होने का मार्ग प्रशस्त किया। यह चुनाव सिर्फ महंगाई के मुद्दे पर आधारित नहीं था, बल्कि इसने दिखाया कि चुनावी रणनीतियां और नेताओं की छवि का चुनावी परिणामों पर गहरा प्रभाव पड़ता है। इस चुनाव ने दिल्ली में शीला दीक्षित के नेतृत्व में एक नए युग की शुरुआत की, जो दिल्लीवासियों के लिए विकास और समृद्धि के रास्ते खोलने वाला साबित हुआ।









