MADRAS HC: मद्रास उच्च न्यायालय ने तमिलनाडु सरकार को निर्देश दिया है कि राज्य भर की जेलों में उन अधिकारियों के खिलाफ विस्तृत जांच कर उचित कार्रवाई की जाए, जो पुलिसकर्मियों को अपने आवासीय और निजी कार्यों में लगाते हैं। न्यायमूर्ति एस.एम. सुब्रमण्यम की अध्यक्षता में न्यायालय की एकल पीठ ने कहा कि “तमिलनाडु सरकार के गृह, निषेध और उत्पाद शुल्क विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव/प्रधान सचिव को सीबीसीआईडी पुलिस की सहायता से या खुफिया विभाग से आवश्यक जानकारी प्राप्त करके इस मामले की विस्तृत जांच करनी चाहिए।
इसके आधार पर, ऐसे अधिकारियों के खिलाफ आवश्यक कार्यवाही की जाए और सभी संबंधित पुलिसकर्मियों को जेल ड्यूटी पर लौटाया जाए, ताकि वे नियमों के अनुसार जनहित में कार्य कर सकें।”
MADRAS HC: याचिकाकर्ता की शिकायतें और चिंता
इस मामले में याचिकाकर्ता का प्रतिनिधित्व अधिवक्ता एम. राधा कृष्णन और अधिवक्ता पी. पुगलेंथी ने किया। जबकि प्रतिवादी की ओर से अतिरिक्त लोक अभियोजक आर. मुनियप्पराज अदालत में उपस्थित हुए। याचिका में मुख्य रूप से चेन्नई के केंद्रीय जेल-II, पुझल में अनहाइजेनिक स्थिति और कैदियों के लिए दी जाने वाली न्यूनतम सुविधाओं की कमी को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की गई।
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि मॉडल प्रिजन मैनुअल के अनुसार, हर छह कैदियों के लिए एक गार्ड होना चाहिए। पुझल के केंद्रीय जेल-II में 203 जेल वार्डर के पद स्वीकृत हैं, जिनमें से प्रत्येक शिफ्ट में 60 वार्डर होना चाहिए। लेकिन वास्तविकता यह है कि प्रति शिफ्ट केवल 15 वार्डर तैनात हैं, जिससे न केवल कैदियों की सुरक्षा खतरे में है, बल्कि जेल के भीतर और भी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
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याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि डीजीपी, आईजी, डीआईजी, एसपी, अतिरिक्त एसपी और तीन जेलर जैसे उच्चाधिकारियों ने निजी कार्यों और आवासीय सहायता के लिए जेल के पुलिसकर्मियों को हटा लिया है। इसके परिणामस्वरूप, जेल के अंदर वार्डर और कैदियों के बीच लगातार टकराव की स्थिति पैदा होती है, क्योंकि वार्डर को अपनी शिफ्ट से अधिक समय तक काम करने के लिए मजबूर किया जाता है।
MADRAS HC: अदालत का अवलोकन और निर्णय
अदालत ने इस प्रकार के सार्वजनिक सेवकों का दुरुपयोग और शक्ति का दुरुपयोग बताते हुए इसे एक गंभीर मुद्दा माना। अदालत ने कहा, “जब जेल अधिकारियों द्वारा इस प्रकार के संगठित या संरचनात्मक दुरुपयोग के आरोप सामने आते हैं, तो निस्संदेह यह न केवल व्यक्तियों के अधिकारों का हनन करता है, बल्कि इसे संरचनात्मक उल्लंघन माना जाना चाहिए। सार्वजनिक सेवकों को आवासीय कार्यों में लगाना आम जनता की सेवा में बाधा डालता है।”
अदालत ने अपने पहले के फैसले का भी हवाला दिया जिसमें उसने कहा था कि सरकारी कर्मचारी जनता के सेवक हैं और उन्हें करदाताओं के पैसों से वेतन मिलता है। इसके अलावा, उन्हें अपने कर्तव्यों के प्रभावी प्रदर्शन के लिए अन्य सुविधाएं भी प्रदान की जाती हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी स्थिति में, औपनिवेशिक काल की इन पुरानी प्रथाओं को संवैधानिक अदालतें स्वीकार नहीं करेंगी।
MADRAS HC: औपनिवेशिक प्रथाओं की आलोचना और न्यायालय का निर्देश
अदालत ने जेल अधिकारियों द्वारा पुलिसकर्मियों का निजी कार्यों के लिए उपयोग को औपनिवेशिक प्रथाओं का उदाहरण मानते हुए इसे कठोर रूप से खारिज कर दिया। न्यायालय ने कहा कि यह केवल एक असंवैधानिक कृत्य नहीं है, बल्कि जनता के खिलाफ एक अपराध है। इसके लिए संबंधित अधिकारियों के खिलाफ सेवा नियमों के तहत कार्रवाई और अनुशासनात्मक कार्यवाही की जानी चाहिए। अदालत ने कहा कि इन पुलिसकर्मियों का आवासीय कार्यों में उपयोग करने से उनकी वास्तविक ड्यूटी में रुकावट उत्पन्न होती है और यह जेल प्रशासन में गंभीर लापरवाही का कारण बनता है।
न्यायालय ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह कठोर कदम उठाए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि इन सार्वजनिक सेवकों का उपयोग केवल जनहित के लिए किया जाए और उन्हें अधिकारियों के निजी कार्यों में तैनात न किया जाए। अदालत ने कहा कि इस प्रकार के दुरुपयोग से न केवल जेल के भीतर समस्याएं उत्पन्न होती हैं, बल्कि इससे एक नकारात्मक संदेश भी जाता है। जनहित में कार्यरत इन सार्वजनिक सेवकों को उनके वास्तविक कर्तव्यों के प्रति निष्ठावान बने रहना चाहिए, ताकि वे जनता के प्रति अपने जिम्मेदारियों को ईमानदारी से निभा सकें।
MADRAS HC: याचिका का निष्कर्ष
अंततः, अदालत ने इस याचिका को मंजूर करते हुए सरकार को सख्त कदम उठाने का आदेश दिया ताकि औपनिवेशिक प्रथाओं के इस प्रकार के दुरुपयोग को पूरी तरह से समाप्त किया जा सके और सार्वजनिक सेवकों का उपयोग सही और नियमानुसार किया जा सके।








