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SUPREME COURT:दिल्ली HC के आपराधिक रिट पर आश्चर्य जताया

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SUPREME COURT: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 482 और अनुच्छेद 227 के तहत दायर याचिका

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SUPREME COURT: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 482 और अनुच्छेद 227 के तहत दायर याचिका को ‘आपराधिक रिट याचिका’ के रूप में वर्गीकृत करने पर हैरानी और आश्चर्य जताया। न्यायमूर्ति पंकज मिथल और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की खंडपीठ ने इस मुद्दे पर दिल्ली उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल से जवाब मांगा है।

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SUPREME COURT: दिल्ली उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल से जवाब मांगा

सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि उन्हें यह देख कर आश्चर्य हुआ कि अनुच्छेद 227 और धारा 482 के तहत याचिका दायर होने के बावजूद इसे आपराधिक रिट याचिका के तौर पर लिया गया है।

सुनवाई के दौरान न्यायालय ने कहा,
“यद्यपि याचिका अनुच्छेद 227 और धारा 482 सीआरपीसी के तहत दायर की गई है, लेकिन इसे आपराधिक रिट याचिका कैसे कहा जा सकता है? पहली नजर में यह गलत प्रतीत होता है। हम यह समझना चाहते हैं कि इसे आपराधिक रिट याचिका कैसे कहा गया।”

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सुप्रीम कोर्ट ने इस विषय पर उचित जांच की आवश्यकता महसूस करते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल और संबंधित प्रतिवादियों को नोटिस जारी करने के निर्देश दिए।

सुनवाई में कहा गया कि याचिका अनुच्छेद 227 और धारा 482 के तहत दायर की गई थी, लेकिन इसे आपराधिक रिट याचिका के तौर पर वर्गीकृत करना न्यायालय के लिए उचित नहीं प्रतीत होता।

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SUPREME COURT: मामला एफआईआर को रद्द करने से जुड़ा

इस याचिका के केंद्र में दिल्ली उच्च न्यायालय का वह आदेश है, जिसके तहत एक प्राथमिकी (एफआईआर) को रद्द किया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चूंकि पूरी प्रक्रिया पहले ही रद्द की जा चुकी है, इसके बावजूद ‘आपराधिक रिट याचिका’ के नाम पर इसे वर्गीकृत करना स्पष्ट रूप से अनुचित है।

सुप्रीम कोर्ट का यह बयान उस याचिका के आधार पर आया है, जो दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ दायर की गई थी। उच्च न्यायालय ने उस आदेश के तहत एक एफआईआर को रद्द कर दिया था, जिसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका दायर हुई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने इस पहलू पर गहराई से विचार करने और सभी संबंधित पक्षों से जानकारी प्राप्त करने का निर्देश दिया।

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा लागू की गई प्रक्रिया के दायरे और उसके आदेशों की समीक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी याचिका को सही कानूनी संदर्भ में ही वर्गीकृत किया जाना चाहिए और प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित की जानी चाहिए।

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