PUNJAB AND HARAYANA HIGH COURT: चंडीगढ़ – पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने गुरुवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि हिंदू दत्तक ग्रहण एवं भरण-पोषण अधिनियम, 1956 के तहत हिंदू परिवार में हिंदू बच्चे को गोद लेने के लिए रजिस्टर्ड डीड आवश्यक नहीं है।
यह फैसला रेलवे में अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े एक मामले में सुनाया गया, जिसमें एक दत्तक पुत्री को नियुक्ति देने से इनकार कर दिया गया था क्योंकि उसके कक्षा 10वीं के प्रमाण-पत्र में दत्तक माता-पिता के बजाय जैविक माता-पिता के नाम दर्ज थे।
PUNJAB AND HARAYANA HIGH COURT: कोर्ट का महत्वपूर्ण अवलोकन
न्यायमूर्ति संजीव प्रकाश शर्मा और न्यायमूर्ति मीनाक्षी आई. मेहता की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि गोद लेना प्रथागत रूप से या किसी अन्य माध्यम से किया जा सकता है और बाद में इसे लिखित रूप में दर्ज किया जा सकता है।
कोर्ट ने कहा:
“हिंदू दत्तक ग्रहण एवं भरण-पोषण अधिनियम, 1956 के अनुसार, गोद लेने की प्रक्रिया रजिस्टर्ड डीड के माध्यम से या उसके बिना भी मान्य हो सकती है। गोद लेना और देना दोनों पक्षों – जैविक माता-पिता और दत्तक माता-पिता – की सहमति से होना चाहिए। यदि गोद लेना पहले से ही प्रथागत रूप से किया गया है, तो इसे बाद में भी कानूनी रूप से दर्ज किया जा सकता है।”
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केंद्र सरकार ने CAT के आदेश को दी चुनौती
इस मामले में केंद्र सरकार ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें सरकार को निर्देश दिया गया था कि वह दत्तक पुत्री को अनुकंपा नियुक्ति पर विचार करे।
सरकार की ओर से पेश वकील ने तर्क दिया कि दत्तक-पत्र 2017 में पंजीकृत किया गया, जबकि आवेदक की जन्मतिथि 23 मार्च 1997 है। इस आधार पर सरकार ने दावा किया कि वह कानूनी रूप से गोद ली गई नहीं मानी जा सकती, क्योंकि गोद लेने का पंजीकरण उसके वयस्क होने के बाद हुआ।
हालांकि, हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि –
“एक बार जब दत्तक-पत्र पंजीकृत हो जाता है, तो उसे वैध माना जाएगा, जब तक कि इसे खारिज करने के लिए पर्याप्त प्रमाण न हों।”
दत्तक-पत्र और स्कूल प्रमाण-पत्र पर कोर्ट का विचार
कोर्ट ने माना कि जब आवेदक कक्षा 10वीं में थी, तब कोई रजिस्टर्ड दत्तक-पत्र नहीं था, इसलिए स्कूल प्रमाण-पत्र में जैविक माता-पिता का नाम रहना स्वाभाविक था।
न्यायालय ने कहा:
“जहां तक स्कूल शिक्षा बोर्ड का संबंध है, वे प्रमाण-पत्र में उन्हीं माता-पिता के नाम दर्ज करते हैं, जिनका उल्लेख जन्म के समय किया गया था। पंजीकृत दत्तक-पत्र प्रस्तुत करने के बाद ही इसमें बदलाव किया जा सकता है।”
कोर्ट का अंतिम निर्णय
- सरकार की याचिका खारिज की गई।
- दत्तक पुत्री की अनुकंपा नियुक्ति को केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि उसका नाम 10वीं के प्रमाण-पत्र में दत्तक माता-पिता के स्थान पर जैविक माता-पिता के रूप में दर्ज है।
- एक बार दत्तक-पत्र पंजीकृत होने के बाद, उसे वैध माना जाएगा।
भारत संघ बनाम सुखप्रीत कौर और अन्य
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