RAJASTHAN COURT VERDICT: राजस्थान हाईकोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसले में धोखाधड़ी के मामले में आरोपी एक बेटी (याचिकाकर्ता) के खिलाफ दर्ज FIR को खारिज कर दिया।
यह मामला इस आधार पर दर्ज किया गया था कि उसने अपने पिता से कुछ धनराशि प्राप्त की थी, जो कथित रूप से शिकायतकर्ता से बेईमानी से प्रलोभन के तहत ली गई थी। शिकायतकर्ता ने याचिकाकर्ता के पिता के साथ बिक्री के लिए एक समझौता किया था, जिसके तहत उसने उन्हें एक निश्चित राशि दी थी।
RAJASTHAN COURT VERDICT: अदालत ने बेटी के खिलाफ लगाए गए आरोपों को खारिज किया
FIR के अनुसार, शिकायतकर्ता ने याचिकाकर्ता के पिता के साथ एक संपत्ति बिक्री समझौता किया था। शिकायतकर्ता का दावा था कि इस समझौते के तहत उसने पिता को कुछ धनराशि प्रदान की थी, जो बाद में याचिकाकर्ता (बेटी) के खाते में स्थानांतरित कर दी गई। शिकायतकर्ता ने इस आधार पर FIR दर्ज कराई कि यह राशि उसके साथ धोखाधड़ी कर ली गई थी और याचिकाकर्ता को इस लेन-देन का लाभ मिला था।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, लगभग दो साल बाद इस राशि का कुछ हिस्सा याचिकाकर्ता के खाते में स्थानांतरित किया गया था। इस आधार पर उसे आरोपी के रूप में नामित किया गया, क्योंकि यह राशि उसी धन से संबंधित थी जो शिकायतकर्ता ने पिता को दी थी।
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याचिकाकर्ता की दलीलें
याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में इस FIR को चुनौती दी और तर्क दिया कि:
- उसे इस लेन-देन में कोई भूमिका नहीं थी।
- उसके खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं था।
- उसे केवल इस आधार पर आरोपी बनाया गया कि उसके खाते में धनराशि आई थी।
- यह मामला प्रतिनिधि दायित्व के सिद्धांत के अंतर्गत नहीं आता, क्योंकि इस मामले में कोई आपराधिक साजिश या मिलीभगत सिद्ध नहीं हुई थी।
राजस्थान हाईकोर्ट का फैसला
न्यायमूर्ति फरजंद अली की पीठ ने सभी पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद अपना निर्णय सुनाया।
न्यायालय ने निम्नलिखित निष्कर्ष निकाले:
- प्रतिनिधि दायित्व का सिद्धांत लागू नहीं होता: अदालत ने माना कि केवल पिता के किए गए कार्यों के लिए बेटी को उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता। प्रतिनिधि दायित्व का नियम इस प्रकार के मामलों में लागू नहीं होता।
- FIR में याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई स्पष्ट आरोप नहीं: FIR में याचिकाकर्ता की किसी भी प्रकार की संलिप्तता का उल्लेख नहीं था। कोई कानूनी सबूत भी मौजूद नहीं था, जिससे यह साबित हो सके कि उसने जानबूझकर या साजिश के तहत यह धन प्राप्त किया।
- धारा 420, 467, 468 IPC के तहत आरोप अस्थिर: अभियोजन पक्ष ने IPC की धारा 420 (धोखाधड़ी), 467 (जालसाजी) और 468 (धोखाधड़ी के उद्देश्य से जालसाजी) के तहत अपराध का दावा किया था। लेकिन न्यायालय ने पाया कि याचिकाकर्ता ने न तो किसी प्रकार की धोखाधड़ी की थी, न ही कोई जालसाजी की थी।
- पिता द्वारा बेटी को धनराशि स्थानांतरित करना अवैध नहीं: न्यायालय ने कहा कि यदि कोई पिता अपनी बेटी को कुछ पैसे देता है, तो इसे अपराध नहीं माना जा सकता। जब तक यह साबित न हो जाए कि याचिकाकर्ता को धन के स्रोत की जानकारी थी और वह किसी आपराधिक षड्यंत्र का हिस्सा थी, तब तक उसे आरोपी नहीं ठहराया जा सकता।
न्यायालय का निर्णय
तर्कों को सुनने और तथ्यों की समीक्षा करने के बाद, न्यायालय ने इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि याचिकाकर्ता के खिलाफ दर्ज FIR निराधार है और इसे बनाए रखने का कोई औचित्य नहीं है।
इस आधार पर राजस्थान हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता (बेटी) के खिलाफ दर्ज FIR को खारिज कर दिया।
इस फैसले का महत्व
- परिवार के सदस्यों को दोषी ठहराने की प्रवृत्ति पर रोक: यह निर्णय इस बात को रेखांकित करता है कि केवल परिवार का सदस्य होने के आधार पर किसी को आरोपी नहीं बनाया जा सकता।
- प्रतिनिधि दायित्व का स्पष्ट स्पष्टीकरण: हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रतिनिधि दायित्व (Vicarious Liability) का नियम इस प्रकार के मामलों में लागू नहीं होता है।
- अनुचित अभियोजन को हतोत्साहित करना: यह फैसला ऐसे मामलों में महत्वपूर्ण सिद्धांत स्थापित करता है, जहां केवल धन के हस्तांतरण के आधार पर किसी को आरोपी बना दिया जाता है।
ठोस सबूतों के अभाव में FIR खारिज
राजस्थान हाईकोर्ट का यह निर्णय कानून के दृष्टिकोण से काफी महत्वपूर्ण है। यह दिखाता है कि किसी भी व्यक्ति को केवल पारिवारिक संबंधों के आधार पर आरोपी नहीं बनाया जा सकता, जब तक कि उसके खिलाफ ठोस सबूत न हों।
केस टाइटल: भारती शर्मा बनाम राजस्थान राज्य और अन्य।
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