SUPREME COURT: सुप्रीम कोर्ट ने मरुमक्कतायम पर्सनल लॉ के तहत एक ऐतिहासिक फैसले में यह स्पष्ट किया है कि यदि विभाजन के समय कोई महिला अविवाहित है, तो वह संपत्ति पर व्यक्तिगत अधिकार रखती है। यह अधिकार भविष्य में उसके बच्चों के होने के बावजूद भी बना रहेगा। अदालत ने 1967 के मैरी चेरियन बनाम भार्गवी पिल्लई भासुरा देवी मामले में केरल हाईकोर्ट के फैसले को इस हद तक पलट दिया।
न्यायमूर्ति सी.टी. रविकुमार और न्यायमूर्ति संजय करोल की पीठ ने यह भी निर्देश दिया कि यह निर्णय केवल भविष्य के मामलों पर लागू होगा। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में स्पष्ट किया कि मरुमक्कतायम कानून के तहत “थावझी” की संरचना को सही तरीके से समझने की जरूरत है।
SUPREME COURT: थावझी की परिभाषा और अदालत का दृष्टिकोण
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि “थावझी एक समूह होता है जिसमें मुख्य महिला और उसकी भविष्य की पीढ़ियां शामिल होती हैं। थावझी बनने के लिए यह अनिवार्य है कि समूह में कम से कम एक महिला हो और उसकी सीधी पीढ़ी, चाहे वह पुरुष हो या महिला, शामिल हो।”
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अदालत ने यह स्पष्ट किया कि किसी भी महिला को विभाजन के समय प्राप्त संपत्ति पर पूर्ण व्यक्तिगत अधिकार दिया जाएगा। इसका मतलब है कि यह संपत्ति महिला के नियंत्रण में रहेगी और इसे “थारवड” (संयुक्त परिवार संपत्ति) की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
SUPREME COURT: मैरी चेरियन केस का पुनरीक्षण
1967 में केरल हाईकोर्ट ने मैरी चेरियन बनाम भार्गवी पिल्लई भासुरा देवी मामले में यह निर्णय दिया था कि मरुमक्कतायम कानून के तहत विभाजन में प्राप्त संपत्ति को थावझी की संपत्ति माना जाएगा। इस फैसले के तहत यह तर्क दिया गया था कि विभाजन के बाद महिला के पास “एकल सदस्य थावझी” का गठन हो जाता है, जो उसकी भावी पीढ़ियों को भी अधिकार देता है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अल्पमत की राय को प्राथमिकता दी, जिसमें कहा गया था कि विभाजन का स्वभाव ही संपत्ति को संयुक्त स्वामित्व से व्यक्तिगत स्वामित्व में बदलने का होता है।
SUPREME COURT: न्यायालय की प्रमुख टिप्पणियां
अदालत ने अपने फैसले में कहा,
“विभाजन के समय अविवाहित महिला को जो संपत्ति प्राप्त होती है, वह उसकी व्यक्तिगत संपत्ति होती है। भले ही भविष्य में उसके बच्चे हों, इस संपत्ति का स्वभाव व्यक्तिगत बना रहता है।”
अदालत ने यह भी जोड़ा कि थावझी बनने के लिए केवल एक महिला का होना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए उसके साथ उसकी भविष्य की पीढ़ी का होना आवश्यक है।
SUPREME COURT: कानून का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने मैरी चेरियन मामले के बहुमत के विचार को खारिज करते हुए कहा कि उस फैसले में थावझी की संरचना को लेकर गलत समझ बनाई गई थी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि “थावझी” का गठन केवल तभी हो सकता है जब महिला की उत्तरवर्ती पीढ़ियां, चाहे पुरुष हों या महिला, उसके साथ मौजूद हों।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि विभाजन के समय प्राप्त संपत्ति को भविष्य की संभावनाओं के आधार पर थावझी संपत्ति मानने का कोई आधार नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से यह सुनिश्चित हुआ है कि मरुमक्कतायम कानून के तहत महिलाओं को प्राप्त संपत्ति पर उनका पूर्ण और व्यक्तिगत अधिकार होगा। यह फैसला महिलाओं के अधिकारों को सशक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
SUPREME COURT: मामले का विवरण
मामला: रामचंद्रन और अन्य बनाम विजयन् और अन्य
न्यायालय का सिटेशन: 2024 INSC 885
पक्षकार: अपीलकर्ता की ओर से एओआर ए. रघुनाथ ने पक्ष रखा, जबकि प्रतिवादियों की ओर से एओआर एम. पी. विनोद और अधिवक्ता अतुल शंकर विनोद ने तर्क प्रस्तुत किए।
SUPREME COURT: न्यायालय का निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट ने अपील को खारिज करते हुए कहा,
“विभाजन का स्वभाव ही संपत्ति के स्वामित्व में बदलाव करता है। विभाजन के समय अविवाहित महिला को प्राप्त संपत्ति व्यक्तिगत हो जाती है और यह उसके भविष्य के बच्चों के लिए थावझी संपत्ति नहीं बन सकती।”
इस प्रकार, यह निर्णय महिलाओं के संपत्ति अधिकारों के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण दिशा निर्धारित करता है।
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