SUPREME COURT: सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय साझेदारी अधिनियम, 1932 की धारा 37 के तहत यह स्पष्ट किया है कि यदि कोई साझेदार फर्म की संपत्तियों के साथ व्यापार कर रहा है, तो अंतिम समझौते के होने तक निकासी करने वाले साझेदार को फर्म के खाता और उससे उत्पन्न लाभ में अपने हिस्से का अधिकार होगा।
यह आदेश सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसे मामले में दिया, जिसमें मद्रास उच्च न्यायालय द्वारा पारित एक अंतिम निर्णय को चुनौती दी गई थी। इस निर्णय में उच्च न्यायालय ने अपील और प्रतिवादक के खिलाफ दी गई क्रॉस आपत्ति पर विचार किया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में जहां एक साझेदार अपने हिस्से से बाहर निकलता है, वह फर्म के संपत्तियों के लाभ और खाता के हिस्से में अपने हिस्से का दावा कर सकता है, जब तक अंतिम समझौता नहीं हो जाता।
SUPREME COURT: मामला
यह मामला एक साझेदारी फर्म “क्रिस्टल ट्रांसपोर्ट सर्विस” के विघटन से संबंधित था। याचिकाकर्ता ने यह आरोप लगाया था कि फर्म में 1972-73 में चार साझेदार थे, जिनमें वह भी शामिल था। बाद में, 1978 में, अन्य साझेदारों ने बिना याचिकाकर्ता की सहमति के फर्म के पैसों को एक निजी लिमिटेड कंपनी (प्रतिवादी 4) में स्थानांतरित कर दिया। याचिकाकर्ता ने जब खातों की मांग की, तो उन साझेदारों ने मना कर दिया। इसके बाद याचिकाकर्ता ने फर्म के विघटन और खाता सेटेलमेंट के लिए एक मुकदमा दायर किया।
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सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ, जिसमें मुख्य न्यायधीश डी.वाई. चंद्रचूड, न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा शामिल थे, ने भारतीय साझेदारी अधिनियम, 1932 की धारा 37 का हवाला देते हुए यह स्पष्ट किया कि यदि एक साझेदार फर्म की संपत्तियों से व्यवसाय कर रहा है, तो उसे अपने हिस्से से उत्पन्न लाभ में से खाता मांगने का अधिकार है।
कोर्ट ने कहा कि निकासी करने वाले साझेदार को तब तक यह अधिकार प्राप्त रहेगा जब तक अंतिम समझौता नहीं हो जाता। इसके अलावा, अगर कोई साझेदार अपने हिस्से को पूरी तरह से प्राप्त नहीं करता है, तो वह किसी भी प्रकार के लाभ या खाता की मांग कर सकता है।
SUPREME COURT: न्यायालय की टिप्पणी
कोर्ट ने कहा, “इसलिए, भारतीय साझेदारी अधिनियम की धारा 37 के तहत यदि चौथा प्रतिवादी (आपत्तिकर्ता) फर्म की संपत्तियों के साथ व्यापार कर रहा है, तो अंतिम समझौते के होने तक, यह दावा करने वाले साझेदार (जो कि निकासी करने वाले साझेदार के रूप में वर्गीकृत होगा) को खाता और लाभ में अपने हिस्से का अधिकार होगा।”
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी नोट किया कि सत्र न्यायालय ने याचिकाकर्ता को मुआवजा देने का आदेश नहीं दिया, जो कि भारतीय साझेदारी अधिनियम की धारा 37 और 48 के तहत अनिवार्य था। कोर्ट ने इस तथ्य को रेखांकित किया कि फर्म के सभी साझेदारों के बीच खाता और लाभ का सही तरीके से विभाजन किया जाना चाहिए।
मामले की सुनवाई के दौरान, उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता की अपील को मंजूरी दी और प्रतिवादी के क्रॉस आपत्ति को खारिज कर दिया। उच्च न्यायालय ने माना कि फर्म के विघटन के बाद याचिकाकर्ता का हिस्सा उसके द्वारा स्थानांतरित किए गए संपत्तियों में से होना चाहिए, और उन्हें पूरा लाभ मिलना चाहिए।
उच्च न्यायालय के इस आदेश को चुनौती दी गई थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालय के आदेश को सही ठहराया और सत्र न्यायालय को उचित निर्देश दिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि सत्र न्यायालय को यह सुनिश्चित करने का आदेश दिया गया था कि किसी भी साझेदार के द्वारा फर्म की संपत्तियों से उत्पन्न लाभ में से उसे उसका हिस्सा मिल सके, जब तक फाइनल समझौता नहीं हो जाता।
SUPREME COURT: अदालत का अंतिम निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने मामले में हस्तक्षेप नहीं किया और कहा कि यह मामला सत्र न्यायालय के पास भेजा जाएगा, जहां इसे सही तरीके से निपटाया जाएगा। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कोई भी निर्णय पारित करने से पहले सभी पक्षों की ओर से साक्ष्य पेश किए जाएंगे। इससे यह स्पष्ट होता है कि कोर्ट किसी भी मामले में अंतिम निर्णय देने से पहले पक्षों के सभी प्रमाणों और साक्ष्यों की उचित जांच करने का पक्षधर है।
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय साझेदारी फर्मों में निकासी करने वाले साझेदारों के अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण है। इसने यह स्पष्ट किया कि एक साझेदार को अपनी हिस्सेदारी और फर्म से उत्पन्न लाभ में हिस्सा लेने का अधिकार है जब तक अंतिम समझौता नहीं हो जाता। यह निर्णय साझेदारी के मामलों में खाता और लाभ के विभाजन को लेकर एक नई दिशा निर्धारित करता है और यह सुनिश्चित करता है कि निकासी करने वाले साझेदार को उनके हिस्से का उचित लाभ मिले।
इसके अतिरिक्त, यह निर्णय भारतीय साझेदारी अधिनियम की धारा 37 और 48 को सही तरीके से लागू करने की आवश्यकता को भी रेखांकित करता है, ताकि कोई भी साझेदार अपने हिस्से का उचित अधिकार प्राप्त कर सके।








