SUPREME COURT: सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा कि एक सहमति से बना संबंध, जो बाद में विवाह में परिणत नहीं होता, उसे आपराधिक रूप में नहीं देखा जा सकता। इस निर्णय में कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376(2)(n) और 506 के तहत दर्ज FIR को रद्द कर दिया और दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश को खारिज कर दिया।
हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए FIR को बरकरार रखा था। सुप्रीम कोर्ट ने इस निर्णय में कहा कि इस प्रकार के मामलों में आपराधिक प्रक्रिया का पालन करना कानून का दुरुपयोग होगा, खासकर जब दोनों पक्ष सहमति से रिश्ते में थे और अब वे अपनी ज़िंदगियों में आगे बढ़ चुके हैं।
SUPREME COURT: कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर दिया गया निर्णय
न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति नोंगमीकापम कोटिस्वर सिंह की पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा, “दोनों पक्षों के बीच का रिश्ता आपसी सहमति पर आधारित था। एक सहमति से बने रिश्ते का टूटना, किसी भी हाल में अपराध की श्रेणी में नहीं आता।” कोर्ट ने कहा कि जब दोनों पक्षों के बीच कोई आपसी सहमति और कोई धमकी नहीं थी, तो उस रिश्ते के टूटने को बलात्कार या अपराध का रूप देना अनुचित होगा।
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इसके अलावा, कोर्ट ने यह भी माना कि दोनों पक्ष अब किसी अन्य व्यक्ति से शादी कर चुके हैं और अपने-अपने जीवन में आगे बढ़ चुके हैं, इसलिये अभियोजन की प्रक्रिया को जारी रखना कानून के दुरुपयोग के समान होगा।
SUPREME COURT: मामला कैसे सामने आया?
यह मामला एक शिकायत पर आधारित था, जिसमें शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि याचिकाकर्ता ने उसे बार-बार शारीरिक संबंध बनाने के लिए मजबूर किया था। शिकायतकर्ता का कहना था कि याचिकाकर्ता ने 2017 में उससे संपर्क किया था और फिर 2019 में उसके साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाए।
जब याचिकाकर्ता ने उससे शादी करने से इनकार कर दिया, तब शिकायतकर्ता ने उससे परेशान होकर FIR दर्ज करवाई। हालांकि याचिकाकर्ता ने यह आरोप लगाया कि दोनों के बीच एक सहमति से रिश्ता था और शिकायतकर्ता ने उसे अपनी मर्जी से शारीरिक संबंध बनाने की अनुमति दी थी।
SUPREME COURT: सुप्रीम कोर्ट ने दी महत्वाकांक्षी व्याख्या
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सहमति (Consent) के महत्व पर बल दिया और कहा कि यदि किसी रिश्ते में दोनों पक्षों की सहमति से शारीरिक संबंध होते हैं, तो उस रिश्ते के टूटने के बाद इसे बलात्कार के रूप में नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि सहमति में एक ठोस और समझदारी भरे निर्णय का तत्व होना चाहिए, और यह महत्वपूर्ण है कि इस निर्णय में कोई दबाव, धमकी या शारीरिक हिंसा न हो।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि दोनों पक्षों के बीच किसी प्रकार की हिंसा या धमकी नहीं थी और यह रिश्ता स्वेच्छा से स्थापित हुआ था, तो इसे बाद में बलात्कार का रूप नहीं दिया जा सकता। यह फैसला कोर्ट के पूर्व निर्णयों पर आधारित था, जिसमें यह कहा गया था कि एक सहमति से बने रिश्ते को, जब तक उसमें कोई अप्राकृतिक या आपराधिक तत्व न हो, अपराध नहीं माना जा सकता।
SUPREME COURT: बलात्कार और धमकी के आरोपों पर टिप्पणी
कोर्ट ने बलात्कार और धमकी के आरोपों पर भी गौर किया और कहा कि इस मामले में बलात्कार का कोई मामला नहीं बनता। इसके अलावा, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि शिकायतकर्ता के खिलाफ कोई आपराधिक धमकी का मामला भी नहीं बनता। शिकायतकर्ता ने यह आरोप लगाया था कि याचिकाकर्ता ने उसे शादी का झांसा दिया और फिर शारीरिक संबंध बनाए, परंतु कोर्ट ने इस मुद्दे को भी खारिज कर दिया।
कोर्ट ने कहा कि इस प्रकार के रिश्ते में सहमति के अभाव को बलात्कार या धमकी के रूप में नहीं देखा जा सकता, खासकर तब जब दोनों पक्ष अपनी-अपनी इच्छाओं से इस रिश्ते में शामिल हुए थे।
अंततः सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में याचिका को मंजूरी देते हुए FIR को रद्द कर दिया। कोर्ट ने यह भी कहा कि मामले में आगे कोई जांच की आवश्यकता नहीं है और अभियोजन की प्रक्रिया जारी रखने से कोई लाभ नहीं होगा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दोनों पक्षों के बीच कोई भी आपराधिक गतिविधि नहीं थी और इसलिए मामला बंद किया जाता है।
इस निर्णय से यह साफ हो गया कि यदि एक रिश्ते में दोनों पक्षों की सहमति है और कोई भी धोखाधड़ी, धमकी या हिंसा नहीं है, तो उस रिश्ते के टूटने के कारण कोई आपराधिक कार्रवाई नहीं की जा सकती।
SUPREME COURT: न्यायिक दृष्टिकोण और समाज में संदेश
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय भारतीय न्यायिक प्रणाली में सहमति और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के महत्व को फिर से रेखांकित करता है। यह निर्णय समाज में यह संदेश देता है कि सहमति से बने रिश्तों में जब कोई बुराई नहीं होती, तो उन रिश्तों को आपराधिक आरोपों से जोड़ना अनुचित है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून का दुरुपयोग और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की अवहेलना नहीं की जा सकती।
इस निर्णय से यह भी स्पष्ट हो गया है कि न्यायालय अपने निर्णयों के माध्यम से समाज में बलात्कार, हिंसा और धमकी के मामलों में कठोरता दिखाते हुए इस प्रकार के मामलों में कोई भी असमंजस पैदा होने पर अदालत को परिष्कृत दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है।
मामला: प्रशांत बनाम राज्य (एनसीटी दिल्ली)
तटस्थ उद्धरण: 2024 INSC 879
प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता: अधिवक्ता सुनील कुमार अग्रवाल, निखिल त्यागी, अतुल अग्रवाल, राकेश कुमार खरे, किर्ती शर्मा और श्रेया सौरभ।
- उत्तरदाता: अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल विक्रमजीत बनर्जी, अधिवक्ता अजय कुमार प्रजापति, आयुष आनंद, अनिरुद्ध शर्मा, वीर विक्रांत सिंह, और अधिवक्ता मुकेश कुमार मौरिया।








