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केरल उच्च न्यायालय: अवैध पोस्टर फाड़ना गैरकानूनी नहीं: केरल हाईकोर्ट ने इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष पर पोस्टर हटाने वाले पर्यटक के खिलाफ आपराधिक मामला रद्द किया

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केरल उच्च न्यायालय ने एक यहूदी वंश की ऑस्ट्रेलियाई पर्यटक के खिलाफ चल रहे आपराधिक मामले को रद्द कर दिया है, जिस पर इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष

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केरल उच्च न्यायालय ने एक यहूदी वंश की ऑस्ट्रेलियाई पर्यटक के खिलाफ चल रहे आपराधिक मामले को रद्द कर दिया है, जिस पर इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष से जुड़े पोस्टर हटाने का आरोप था। यह घटना फोर्ट कोच्चि में हुई, जब पर्यटक ने “साइलेंस इज वायलेंस, स्टैंड अप फॉर ह्यूमैनिटी” नारे वाले दो पोस्टर देखे। इन संदेशों से परेशान होकर, उसने और उसके एक दोस्त ने स्थानीय पर्यटन कार्यालय के माध्यम से इन पोस्टरों को हटवाने की कोशिश की, लेकिन जब ऐसा नहीं हुआ, तो उन्होंने खुद ही पोस्टर फाड़ने का निर्णय लिया।

केरल उच्च न्यायालय

केरल उच्च न्यायालय: शिकायत और आपराधिक मामला

इस कार्रवाई के बाद, जमात-ए-इस्लामी से जुड़े स्टूडेंट्स इस्लामिक ऑर्गनाइजेशन के क्षेत्र सचिव ने उसके खिलाफ शिकायत दर्ज कराई। इसके चलते उसके खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 153 के तहत आपराधिक मामला दर्ज किया गया, जो दंगे भड़काने के कार्यों के लिए दंडित करती है। इसके अंतर्गत किसी व्यक्ति को इस तरह का कृत्य करने पर दंडित किया जाता है, जिससे समुदायों के बीच शांति भंग हो और दंगे की स्थिति उत्पन्न हो सके।

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केरल उच्च न्यायालय: लुकआउट नोटिस और न्यायालय में चुनौती

हालांकि, पर्यटक को जमानत मिल गई थी, लेकिन उसके खिलाफ लुकआउट नोटिस जारी होने के कारण उसे देश छोड़ने से रोका गया, जिसके परिणामस्वरूप उसे हवाई अड्डे पर हिरासत में लिया गया। इस स्थिति के बाद, उसने उच्च न्यायालय में आपराधिक कार्यवाही की वैधता को चुनौती दी। उसने अदालत में अपील की कि उसके खिलाफ मामला असंगत है, क्योंकि उसने पोस्टरों को हटाने के पीछे किसी भी दंगे या हिंसा का उद्देश्य नहीं था।

केरल उच्च न्यायालय: न्यायमूर्ति की टिप्पणी

न्यायमूर्ति बेचू कुरियन थॉमस की पीठ ने कहा, “यदि बिना अनुमति के कोई पोस्टर लगाया गया है, तो यह निस्संदेह एक अवैध कृत्य है। एक अवैध पोस्टर को हटाना, भले ही वह किसी निजी व्यक्ति द्वारा किया गया हो, इसे दुर्भावनापूर्ण या जानबूझकर किया गया अवैध कार्य नहीं कहा जा सकता, हालांकि आदर्श रूप से याचिकाकर्ता को स्वयं इसे हटाने के बजाय कानून प्रवर्तन एजेंसियों से संपर्क करना चाहिए था। चूंकि बिना किसी कानूनी अधिकार के लगाए गए पोस्टर को फाड़ना सख्ती से अवैध कृत्य की परिभाषा में नहीं आता है, इसलिए धारा 153 के मुख्य तत्व अंतिम रिपोर्ट में अनुपस्थित हैं।”

केरल उच्च न्यायालय: आईपीसी की धारा 153 के तहत मामला रद्द

केरल उच्च न्यायालय में याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता ब्लेज के. जोस उपस्थित हुए और प्रतिवादियों की ओर से लोक अभियोजक श्रीजा वी ने पैरवी की। कोर्ट ने यह निष्कर्ष निकालने के बाद याचिकाकर्ता को राहत दी कि आईपीसी की धारा 153 के तहत अपराध के लिए आवश्यक तत्व इस मामले में मौजूद नहीं थे। न्यायमूर्ति ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता का कृत्य बिना किसी दुर्भावनापूर्ण उद्देश्य के था, और इसे दंगे की उत्तेजना के रूप में नहीं देखा जा सकता।

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केरल उच्च न्यायालय: अदालत का अवलोकन

कोर्ट ने टिप्पणी की, “अंतिम रिपोर्ट में यह भी नहीं कहा गया है कि पोस्टर जानबूझकर या इस इरादे से फाड़े गए थे कि इससे किसी को दंगा करने के लिए उकसाया जाएगा। अंतिम रिपोर्ट में यह भी नहीं बताया गया है कि याचिकाकर्ता को इस बात की जानकारी थी कि पोस्टर फाड़ने से दंगे का अपराध होगा या लोगों को दंगा करने के लिए प्रेरित किया जाएगा।” इस प्रकार, अदालत ने इस बात को रेखांकित किया कि अभियोजन पक्ष ने यह साबित करने के लिए कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया कि याचिकाकर्ता का उद्देश्य हिंसा फैलाना था।

केरल उच्च न्यायालय: याचिका को मंजूरी

अंततः कोर्ट ने याचिकाकर्ता के खिलाफ आपराधिक मामले को रद्द कर दिया। कोर्ट ने इस मामले में तर्क दिया कि बिना किसी कानूनी अनुमति के लगाए गए पोस्टरों को हटाना किसी भी प्रकार से अवैध नहीं माना जा सकता है। इसके अतिरिक्त, अदालत ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता के खिलाफ लुकआउट नोटिस जारी करना और उसे देश छोड़ने से रोकना भी उचित नहीं था, क्योंकि उसने कानून का कोई उल्लंघन नहीं किया था।

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केरल उच्च न्यायालय: मामले का परिणाम और कानूनी प्रभाव

इस मामले का परिणाम यह है कि किसी भी अवैध रूप से लगाए गए पोस्टर को हटाने को, चाहे वह किसी भी व्यक्तिगत विचारधारा या सोच से प्रेरित हो, अदालत ने अवैध कृत्य नहीं माना है। यह निर्णय यह भी स्पष्ट करता है कि अगर कोई पोस्टर बिना कानूनी अनुमति के लगाया गया है, तो उसे हटाने का कार्य गैरकानूनी नहीं माना जाएगा।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी प्रकार की ऐसी कार्रवाई, जिसे कानून के तहत उचित माना जाए, को दुर्भावनापूर्ण कार्य के रूप में नहीं देखा जा सकता, बशर्ते वह कार्रवाई किसी भी प्रकार से दंगा या हिंसा फैलाने के उद्देश्य से न की गई हो।

मामला शीर्षक: ज़ारा मिशेल शिलांस्क बनाम केरल राज्य एवं अन्य, [2024:KER:68941]

पैरवी में उपस्थित: याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता ब्लेज के. जोस, निखिल संजय, ट्रीसा रोज, और एरिन जोबी।

दिल्ली हाईकोर्ट

Regards:-Radha Rani Advocate for Lady Member Executive ,ROHONI COURT BAR ASSOCIATION

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Headlines Live News Desk हमारी आधिकारिक संपादकीय टीम है, जो राजनीति, क्राइम और राष्ट्रीय मुद्दों पर तथ्यात्मक और विश्वसनीय रिपोर्टिंग करती है।

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