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मद्रास उच्च न्यायालय: रजिस्ट्री के समक्ष ट्रायल संभव नहीं: मद्रास हाईकोर्ट ने परिवार न्यायालय को पत्नी की याचिका संख्या देने का निर्देश दिया

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मद्रास उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण मामले में परिवार न्यायालय को निर्देश दिया कि वह हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 9 के तहत पत्नी

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मद्रास उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण मामले में परिवार न्यायालय को निर्देश दिया कि वह हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 9 के तहत पत्नी द्वारा दायर याचिका को बिना किसी अनावश्यक देरी के संख्या दे। कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि याचिका को दर्ज करते समय सबूतों की मांग करना याचिकाकर्ता को कठिनाई में डाल सकता है और यह न्याय प्रक्रिया के लिए अनावश्यक बाधा पैदा करता है।

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मद्रास उच्च न्यायालय: रजिस्ट्री के समक्ष कोई ट्रायल संभव नहीं

यह मामला तब प्रकाश में आया जब प्रधान परिवार न्यायालय ने पत्नी द्वारा हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 9 के तहत दायर याचिका को नंबर देने से इनकार कर दिया था। प्रधान परिवार न्यायालय ने याचिका की वैधता पर सवाल उठाया, यह दावा करते हुए कि याचिकाकर्ता को पहले यह प्रमाणित करना चाहिए कि वह हिंदू हैं, क्योंकि रजिस्ट्री में उन्हें ईसाई के रूप में सूचीबद्ध किया गया था।

इस पर न्यायमूर्ति वी. लक्ष्मीनारायणन की पीठ ने टिप्पणी की कि याचिका को संख्या देने के समय सबूत मांगने से याचिकाकर्ता को कठिनाई हो सकती है। पीठ ने कहा, “रजिस्ट्री के समक्ष कोई ट्रायल नहीं हो सकता है, और फिर से एक अन्य ट्रायल तब होगा जब प्रतिवादी अपनी काउंटर दाखिल करेगा और कोर्ट द्वारा मुद्दों को तय किया जाएगा।” उन्होंने कहा कि यह प्रक्रिया केवल अनावश्यक रूप से समय बर्बाद करेगी और याचिकाकर्ता के लिए न्याय पाने की प्रक्रिया को कठिन बनाएगी।

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मद्रास उच्च न्यायालय: विवाह की पृष्ठभूमि और विवाद

मामले के संक्षिप्त तथ्यों के अनुसार, याचिकाकर्ता और प्रतिवादी का विवाह 2011 में हुआ था, और उनके दो बच्चे हैं। पति ने बाद में तलाक के लिए याचिका दायर की, जिसमें दावा किया गया कि उनका विवाह ईसाई रीति-रिवाजों के तहत हुआ था। दूसरी ओर, पत्नी ने इसका खंडन करते हुए कहा कि उनका विवाह 2010 में एक साधारण समारोह में हुआ था, जिसे 2011 में मंदिर में औपचारिक रूप से संपन्न किया गया था।

इस विवाद के चलते पत्नी ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना के लिए याचिका दायर की। उन्होंने यह दावा किया कि दोनों पति-पत्नी हिंदू हैं, और उनका विवाह हिंदू धर्म के तहत हुआ था। हालांकि, रजिस्ट्री ने उनकी याचिका को यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि उनके दस्तावेज़ों में उन्हें ईसाई के रूप में सूचीबद्ध किया गया है, जिससे याचिका की वैधता पर सवाल उठता है।

मद्रास उच्च न्यायालय: विवाह प्रमाणपत्र का महत्व

इस विवाद के बीच, न्यायालय ने याचिकाकर्ता के विवाह प्रमाणपत्र पर ध्यान केंद्रित किया, जो विवाह अधिकारी-सह-सब रजिस्ट्रार द्वारा जारी किया गया था। इस प्रमाणपत्र से यह स्पष्ट था कि विवाह 2011 में हुआ था। न्यायमूर्ति लक्ष्मीनारायणन ने कहा कि यह प्रमाणपत्र यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि विवाह हुआ था और इसके आधार पर याचिका की संख्या दी जानी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि रजिस्ट्री द्वारा यह सवाल उठाना कि याचिकाकर्ता को पहले यह प्रमाणित करना चाहिए कि वह हिंदू हैं, अनावश्यक है और न्याय प्रक्रिया में देरी का कारण बन सकता है।

मद्रास उच्च न्यायालय: सेल्वराज बनाम कुडनकुलम न्यूक्लियर पावर प्लांट मामले का हवाला

न्यायालय ने अपने फैसले में सेल्वराज बनाम कुडनकुलम न्यूक्लियर पावर प्लांट इंडिया लिमिटेड (2021) मामले का हवाला दिया। इस मामले में, न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि अदालत को याचिका में दिए गए तर्कों के आधार पर कार्यवाही करनी चाहिए और ऐसा नहीं होना चाहिए कि वह मुकदमे का पक्षकार बन जाए। न्यायमूर्ति लक्ष्मीनारायणन ने कहा, “न्यायालय को याचिका में दिए गए तर्कों के आधार पर कार्रवाई करनी चाहिए, न कि ऐसा बर्ताव करना चाहिए जैसे वह प्रतिवादी की भूमिका निभा रहा हो।”

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उन्होंने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता ने कहीं भी यह नहीं कहा है कि वह ईसाई हैं, बल्कि उनका स्पष्ट तर्क यह है कि यह कार्यवाही एक जाली दस्तावेज़ पर आधारित है। ऐसे में, कोर्ट द्वारा याचिका को बार-बार लौटाना और याचिकाकर्ता से यह प्रमाणित करने के लिए कहना कि वे हिंदू हैं, गलत है।

न्यायालय ने यह भी कहा कि जब एक याचिकाकर्ता अदालत में कोई याचिका दायर करता है, तो यह अदालत की जिम्मेदारी होती है कि वह याचिका को सही तरीके से देखे और उस पर बिना किसी अनावश्यक देरी के कार्रवाई करे। अदालत ने कहा कि न्याय प्रक्रिया में अनावश्यक देरी करना न केवल याचिकाकर्ता के अधिकारों का हनन करता है, बल्कि यह पूरी न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाता है।

मद्रास उच्च न्यायालय: निर्णय का निष्कर्ष

अंततः, मद्रास उच्च न्यायालय ने यह निर्णय लिया कि परिवार न्यायालय को पत्नी द्वारा दायर याचिका को बिना किसी और देरी के संख्या देनी चाहिए। न्यायमूर्ति लक्ष्मीनारायणन ने कहा कि इस मामले में याचिका को बार-बार लौटाने का कोई उचित कारण नहीं था, और न्यायालय को बिना पक्षपात किए याचिका पर कार्रवाई करनी चाहिए थी।

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इस निर्णय से यह स्पष्ट होता है कि न्यायिक प्रक्रियाओं में रजिस्ट्री स्तर पर अनावश्यक बाधाएं नहीं खड़ी की जानी चाहिए। न्यायालयों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि याचिकाकर्ताओं को उनके अधिकारों की प्राप्ति के लिए किसी प्रकार की अनावश्यक कठिनाइयों का सामना न करना पड़े।

मद्रास उच्च न्यायालय के इस आदेश से यह भी स्पष्ट होता है कि अदालतें याचिकाकर्ताओं के साथ निष्पक्षता और त्वरित कार्रवाई के सिद्धांतों का पालन करेंगी और अनावश्यक देरी और सबूत मांगने से बचेंगी।

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